योजनाओं पर उठ रहे सवाल, जनता के सेवक मालामाल,जनता भई कंगाल

# 12 Jul, 2018 Views: 719

 
                   खासखबर बिलासपुर छत्तीसगढ सरकार के बेमिसाल चैदह साल में विकास के नाम पर जनता के सेवक भले ही मामलामाल हो गये हों, लेकिन इन चैदह सालों में गरीब जनता कंगाल हो गई है। यकीन ना हो तो मस्तुरी विधानसभा और एनटीपीसी के गोद में बसे गा्रम पंचायत सीपत के निवासी,शतु्रघन लाल ंिटंगाली और उसकी पत्नी गुलाबा किस तरह अपना और अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे है देखा जा सकता है।


               टीवी चैनलों,अखबारों,बैनरों, पोस्टरों व सोशल मिडिया में जिस तरह करोडों रुपये खर्च कर विज्ञापनों के माध्यम से केन्द्र और छत्तीसगढ सरकार की उपलब्धियों को बतलाया जा रहा है उसे देखकर तो ऐसा ही लगता है मानों छत्तीसगढ में हर तरफ विकास की गंगा बह रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही सच्चाई बयां करती नजर आती है।


          अनुसूचित जाति के शतु्रघन लाल ंिटंगाली और उसकी पत्नी गुलाबा की उम्र साठ साल से उपर की है,दोनों दिव्यांग है। उनके दो बेटी और एक बेटा है। एक बेटी का, जैसे तैसे हाथ पीले कर दिये है। एक बेटा और बेटी को अभी पढा रहे है। उन्हे शासन की पेंशन योजना का लाभ मिलता है वहीं साल भर पहले  उज्वला योजना के तहत गैस चुल्हा और सिलेंडर भी मिला था किन्तु अब उनके पास नहीं है। गरीबी रेखा राशन कार्ड से उन्हे चांवल मिलता है। शारीरिक श्रम नहीं कर पाने की वजह से पेंशन से ही परिवार का भरण पोषण करते आ रहे है।


            झोपडी में जैसे तैसे गरीबी गुजारा कर रहे थे, तभी सरकार नें प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत सर छिपानें एक छत दे दी। प्रधानमंत्री आवास भी अधूरा ही बना है। आवास में भीतर पलस्तर,फलोंिरग,रंग रोगन आज भी अधूरा है। कब पूरा होगा पता नहीं। लोक सेवक और जन सेवक कागजों के आकडों पर विकास का ढोल पीट रहें है।


       शासन की महत्वपूर्ण योजना स्वच्छ भारत मिशन के तहत ले देकर बना शौचालय आज भी आधा अधूरा है। ना पानी है ना बिजली, ना छत डाली ना दरवाजा लगा। ऐसे में उपयोग करें तो कैसे,जमीनी सच्चाई के सामनें सरकारीे विज्ञापनों में विकास का ढिंढोरा,महज दिखावा साबित होता है।


                गैस सिलंडर के बढते दाम और डायन के रुप में बढती मंहगाई,उपर से विकलांगता के दंश और बच्चों की परवरिश में आडे आती गरीबी, के चलते वो महंगे गैस सिलेंडर खरीदने में असमर्थ हैं इसलिये चुल्हे पर लकडी जला कर भोजन पकाते और खाते हैं खाना खा रहे शत्रुघन की थाली में महज पका हुआ चांवल माननीयों के लिये संदेश है कि इनको तख्तोताज पर बिठाई गरीब जनता क्या खा रही जरा इनकी थाली पर भी झांक कर देख लिया करें ,ताकि आपके थाली में सजी छप्पनभोग आपके हलक के नीचे उतरनें से पहले एक बार इनका भी सोच ले।  उनका छोटा सा परिवार जरुर शासन की योजनाओं से मिल रहे लाभ से बैसाखियों पर घिसट तो रहा है लेकिन चल और दौड नहीं रहा है।


              शत्रुघन के बगल में रहने वाले पटेल सुर्यवंशी का जीवन भी कुछ इसी तरह कष्ट में कट रहा ह उन्हे ना तो प्रधानमंत्री आवास मिला है ना ही शौचालय पूरी तरह बना है आज भी उनका परिवार चुल्हे में आग से भोजन पकाता है। बीस सालों से मजदुरी कर परिवार का भरण पोषण करने वाले पटेल का जीवन भी झोपडी में कट रहा है। फिर कैसा विकास।


                  सीपत निवासी उर्मिला बाई और बदन की दिव्यांग बेटी सरस्वती की पीडा आज तक पंचायत दुर नहीं कर पाई। सरस्वती के पिता बदन बतलाते हैं कि इसके विवाह के बाद दिव्यांग सरस्वती को उसके पति नें छोड दिया था,तब से अब तक यह हमारे साथ ही रहती है लेकिन ना तो इसे परित्यक्ता पेंशन मिलती है ना दिव्यांगता ना ही शासन की किसी योजना का लाभ। बेटी है इसलिये हम इसे बेसहारा नहीं छोड सकते। 2014 में खुले बैंक खाते इस बात की दस्दीक करते हैं की पंचायत दवारा इसके दिव्यांग पेंशन हेतू खाता खुलवाया गया था लेकिन आज तक इसे पेंशन नहीं मिली। सरस्वती के आधार कार्ड पर लिखा,आम आदमी का अधिकार आज तलक इसे इसके संवैधानिक अधिकार तो दिला नहीं पाया। दुसरी तरफ सरकार महिला सशक्तिकरण की बाते करती है और वही सरस्वती जैसी ना जाने कितनी बेटियां अपने माॅ बाप की पेंशन पर आश्रित हैं। पिछले चार सालों से खुले बैंक खाते कम से कम सरस्वती के माता पिता की आस बंधाऐं हुए हैं कि सरकार की पेंशन योजना का लाभ उनकी बेटी को एक ना एक दिन जरुर मिलेगा लेकिन कब?


बहरहाल छत्तीसगढ सरकार के मुखिया जन सेवकों और लोक सेवकों के दवारा उनकी सभा में जुटाई भीड देखकर खुश हैं उन्हे लगता है कि उनकी सरकार दवारा किये जा रहे विकास और योजनाओं का लाभ इन माननीय जन सेवको और लोक सेवकों की मदद से जनता को मिल रहा है। देखना होगा कि सही मायने में सरकार की योजनाओं का लाभ पीडित परिवारों को कब तक मिल सकेगा। 
 

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