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खत्म हो रहे ‘रोज़ एप्पल’ के वृक्ष

प संकट में जामुन परिवार का यह सदस्य

बिलासपुर। है जामुन लेकिन सुगंध गुलाब के फूलों जैसी। होता है पीला, गुलाबी और लाल। एकदम सेब की तरह। इसलिए कहते हैं ‘रोज़ एप्पल’ लेकिन इसके वृक्ष भी चला-चली की बेला में है।

पेंड्रा और मरवाही के जंगलों को कभी सफेद जामुन के लिए जाना जाता था। अब यह पहचान खत्म हो रही है। वनवासियों के घरों में ही नजर आने वाली जामुन की यह प्रजाति अब जाकर इसलिए ध्यान में आई है क्योंकि फल के साथ पत्तियों और छाल में ऐसे औषधिय गुणों की पहचान हुई है, जो दैनिक जीवन की स्वास्थ्यगत समस्या दूर कर सकते हैं।


इसलिए रोज़ एप्पल

जामुन परिवार का यह सदस्य परिपक्वता अवधि पूर्ण करने के दो साल बाद फल देना चालू करता है। मार्च-अप्रैल में फूल और मई से जुलाई में फल लगते हैं। पकने के बाद फलों से गुलाब जैसी सुगंध आती है। हल्का पीला, गुलाबी और अंत में लाल रंग का यह फल सेब जैसा नजर आता है। जिसका आकार 2 से 4 सेंटीमीटर व्यास का होता है। यही वजह है कि इसे रोज़ एप्पल के नाम से जाना जाता है।


पोषण मूल्य और औषधीय गुण

विटामिन सी, कैल्शियम और भरपूर फाइबर। एंटीऑक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में होता है। बीज और छाल में हाइपोग्लाइसेमिक तत्व होते हैं। इन महत्वपूर्ण गुणों की वजह से इसे डिहाइड्रेशन से बचने और प्री- रेडिकल्स को कम करने में सहायक माना गया है। फलों का ताजा जूस बनाकर सेवन किया जा सकता है। पत्तियों का काढ़ा बनाकर उपयोग किया जा सकता है। त्वचा रोग से निदान के लिए पत्तियों का पेस्ट बनाकर संक्रमित जगह पर लगाने से समस्या दूर की जा सकती है।


ऐसे मौसम में होता है तैयार

रोज़ एप्पल यानी सफेद जामुन के लिए उष्णकटिबंधीय और उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र को एकदम उपयुक्त माना गया है। भारत के अलावा दक्षिण-पूर्व एशिया और कैरेबियाई देशों में इसके वृक्ष बहुतायत में मिलते हैं। अपने छत्तीसगढ़ की बात करें, तो अब इसके वृक्ष नहीं के बराबर रह गए हैं। ऐसे में यह प्रजाति भी संरक्षण और संवर्धन ही नहीं, पौधरोपण की भी जरूरत मांग रही है।

बेहद गुणकारी है गुलाब जामुन

सिज़ीजियम जाम्बोस (गुलाब जामुन) के फलों में मानव के लिए औषधीय गुणों की एक विस्तृत श्रृंखला होती है, जैसे मधुमेह को नियंत्रित करना, विषाक्तता को कम करना और प्रतिरक्षा प्रणाली को बढ़ावा देना आदि। पौधे विशाल जड़ प्रणाली विकसित करते हैं और नदी तटों पर मिट्टी को स्थिर रखने में सहायक होते हैं। किंतु संरक्षण एवं संवर्धन न होने के कारण यह सिर्फ पेंड्रा तक ही सीमित है।

अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर

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