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छत्तीसगढ़ की पर्यावरणीय धरोहर : कोपरा जलाशय के लिए समेकित नीति की आवश्यकता

रामसर मान्यता के बाद संरक्षण की नई जिम्मेदारियां

बिलासपुर- बनानी होगी प्रदूषण नियंत्रण नीति। समुदाय आधारित संरक्षण पर काम करना जरूरी होगा। रखना होगा कड़ा नियंत्रण अतिक्रमण और भूमि उपयोग परिवर्तन पर। निजी या खंडित स्वामित्व दृष्टिकोण से हटकर ‘सार्वजनिक प्राकृतिक संपदा’ घोषित करने की सख्त जरूरत है क्योंकि कोपरा जलाशय अब केवल बिलासपुर का जलाशय नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ की पर्यावरणीय धरोहर घोषित हो चुका है।

रामसर साइट घोषित हो चुका कोपरा जलाशय अब नीति, विज्ञान और समुदाय का समन्वय मांग रहा है क्योंकि यही तीन ऐसे पक्ष हैं जिससे मजबूत संरक्षण की राह खुलेगी। सशक्त नीति का यह ढांचा कोपरा जलाशय को आने वाले दशकों में जैव विविधता और सतत विकास का मॉडल आर्द्र भूमि क्षेत्र बना सकता है।

इसलिए प्राकृतिक संपदा

आर्द्र भूमियां प्रकृति की ऐसी संरचनाएं हैं जो जल, भूमि, जैव विविधता और मानव जीवन को एक साथ जोड़ती है। इससे जल संग्रहण को मजबूती मिलती है। कोपरा जलाशय साक्षात प्रमाण है जल संग्रहण के मामले में। बारिश के दिनों में जल संचयन कर बाढ़ की तीव्रता कम करता है। इससे ग्रीष्म काल में भूजल स्तर सामान्य बना रहता है। दोहरा लाभ यह कि भरपूर जल भंडारण की वजह से कोपरा जलाशय जलीय वनस्पतियों, मछलियों, उभयचर तथा प्रवासी पक्षियों के साथ स्थानीय पक्षियों के लिए अनुकूल आवास प्रदान कर रहा है। यही वजह है कि यहां की जैव विविधता समृद्ध है। इसलिए रामसर साइट की मान्यता के बाद इसे सार्वजनिक प्राकृतिक संपदा घोषित किए जाने की जरुरत समझी जा रही है। इससे अवांछित गतिविधियों पर प्रभावी रोक लगाने में मदद मिलेगी।

अद्भुत है यह गुण

कोपरा जलाशय को इसलिए अहम माना गया है क्योंकि यह प्राकृतिक रूप से तलछट और जैविक प्रक्रियाओं के माध्यम से जल की गुणवत्ता में सुधार करता है। जलवायु लचीलापन इतना ज्यादा है कि अत्यधिक बारिश, सूखा और तापमान वृद्धि जैसी परिस्थितियों में भी क्षेत्रीय जलवायु को एक स्तर पर बनाए रखने में सक्षम है। यही वजह है कि इसमें पूरे साल दुर्लभ और उपयोगी प्रजातियों को आश्रय मिलता है। जैविक संसाधनों से भरपूर कोपरा जलाशय आजीविका और सामाजिक संबंध का भी पूरा ध्यान रखता है। मछुआरों और पशुपालकों के साथ-साथ ऐसे किसानों की फसल को जीवन देता है, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जलाशय पर आधारित हैं। इस तरह के गुणों से युक्त शायद एकमात्र जलाशय है कोपरा जलाशय।

चुनौती और समाधान

घरेलू और औद्योगिक अपशिष्ट, जल प्रदूषण को बढ़ा रहे हैं। कैचमेंट एरिया में अनियंत्रित निर्माण और कृषि विस्तार से जलाशय का प्राकृतिक स्वरूप खत्म हो रहा है। वनों का रकबा तेजी से घट रहा है। तलछट में गाद का जमाव तेजी से बढ़ रहा है क्योंकि भूमि का अनियंत्रित उपयोग बढ़ा हुआ है। संरक्षण की योजनाएं हैं तो सही लेकिन शासकीय समन्वय नजर नहीं आ रहे हैं। इसलिए संरक्षण योजनाओं का परिणाम शून्य हो चला है। इन सभी स्थितियों को देखते हुए समेकित जल प्रबंधन की प्रभावी नीति बनानी होगी। संरक्षण की योजनाओं में पंचायतों, मछुआरों और स्वयं सेवी समूहों की जिम्मेदारी तय करनी होगी। इसी तरह जलाशय में पहुंच रहे अपशिष्ट पानी का उपचार और नियंत्रित जल गुणवत्ता की जांच अनिवार्य मानी जा रही है। आधुनिक तकनीक के साथ-साथ स्थानीय अनुभव और परंपरागत जल प्रबंधन की नीतियां अपनानी होगी।

कोपरा जलाशय को ‘सार्वजनिक प्राकृतिक संपदा’ घोषित किया जाए

रामसर साइट घोषित कोपरा जलाशय अब केवल स्थानीय जलस्रोत नहीं, बल्कि राज्य की पर्यावरणीय धरोहर है। इसके संरक्षण हेतु सशक्त प्रदूषण नियंत्रण नीति, अतिक्रमण पर कड़ा नियंत्रण और समेकित जल प्रबंधन आवश्यक है। इसे निजी दृष्टिकोण से हटाकर ‘सार्वजनिक प्राकृतिक संपदा’ घोषित कर समुदाय आधारित संरक्षण मॉडल लागू किया जाना चाहिए, जिससे यह भविष्य में सतत विकास का आदर्श बन सके।

अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर

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