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जिले में 3241 हेक्टेयर घटा ग्रीष्मकालीन धान का रकबा….

धान से दूरी,पानी की सुरक्षा,बिलासपुर में खेती का नया मॉडल…

पानी बचाने की मुहिम में किसान और प्रशासन साथ-साथ….

बिलासपुर । जिले में जल संरक्षण को लेकर चलाई जा रही प्रशासनिक मुहिम अब रंग लाने लगी है। ग्रीष्मकालीन धान की खेती पर निर्भरता कम करने के लिए जिला प्रशासन और कृषि विभाग द्वारा किए गए प्रयासों का सकारात्मक असर साफ दिखाई दे रहा है। इस वर्ष जिले में ग्रीष्मकालीन धान का रकबा 3241 हेक्टेयर कम हुआ है, जो पानी बचाने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

दरअसल कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024-25 में जिले में करीब 13,600 हेक्टेयर क्षेत्र में ग्रीष्मकालीन धान की खेती की गई थी। धान एक ऐसी फसल है, जिसमें पानी की खपत सबसे अधिक होती है। विशेषज्ञों के मुताबिक एक हेक्टेयर धान की फसल के लिए लगभग 80 लाख लीटर पानी की जरूरत होती है। यही कारण है कि गर्मी के मौसम में पेयजल संकट की स्थिति बन जाती थी।इस समस्या को देखते हुए जिला प्रशासन ने किसानों को जागरूक करने के साथ-साथ वैकल्पिक फसलों की ओर प्रेरित किया। राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन और अन्य योजनाओं के तहत किसानों को दलहन और तिलहन फसलों के उन्नत बीज एमएसपी दर पर उपलब्ध कराए गए। मक्का, रागी, गेहूं, चना, उड़द, मूंग और मसूर जैसी फसलों को प्राथमिकता दी गई।पानी बचाने की इस पहल में योगदान देने वाले किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए 45 प्रगतिशील किसानों को सम्मानित भी किया गया। दलहन और तिलहन फसलों में कम पानी लगता है, लागत भी कम होती है और किसानों को बेहतर मुनाफा मिलता है। प्रशासन का मानना है कि ग्रीष्मकालीन धान का रकबा घटने से करोड़ों लीटर पानी की बचत होगी, जिससे आने वाले महीनों में पेयजल संकट से राहत मिलेगी। साथ ही यह कदम आने वाली पीढ़ियों के लिए जल संसाधनों को सुरक्षित रखने की दिशा में एक मजबूत पहल साबित हो रहा है।

वर्जन
ग्रीष्मकालीन धान में पानी की खपत बहुत ज्यादा होती है। एक एकड़ धान में लगभग 40 लाख लीटर पानी खर्च होता है। किसानों में अब धीरे-धीरे जागरूकता आ रही है। कम पानी में अधिक आय देने वाली फसलों को अपनाना भविष्य के लिए जरूरी है।

संजय अग्रवाल
कलेक्टर बिलासपुर

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