अब खत नहीं खतरा ला रहे कबूतर

अनदेखा खतरा, जिसे नज़रअंदाज़ करना हो सकता है घातक
सतीश अग्रवाल
बिलासपुर – हमारे शहरों और कस्बों में कबूतर आम दृश्य हैं। सुबह-शाम दाना चुगते कबूतर, मंदिरों या चौक-चौराहों पर उनके झुंड, या फिर इमारतों की बालकनियों और छतों पर बसेरा किए हुए कबूतर हमें परिचित और प्यारे लगते हैं। बहुत से लोग इन्हें दाना डालना पुण्य का काम मानते हैं। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि यही कबूतर हमारी सेहत को कितनी बड़ी हानि पहुँचा सकते हैं? हाल ही में पुणे की एक घटना ने यह सच्चाई सबके सामने रख दी, जिसमें एक महिला की मृत्यु कबूतरों से फैली बीमारी के कारण हो गई।

कबूतर और शहरी जीवन
कबूतर हजारों साल से मनुष्य के साथ रहते आए हैं। पहले इन्हें संदेशवाहक, भोजन स्रोत और धार्मिक प्रतीक के रूप में महत्व मिला। परंतु आज शहरीकरण और मानव आदतों के कारण कबूतरों की संख्या असामान्य रूप से बढ़ गई है।
- लोग दाना डालकर इन्हें प्रोत्साहित करते हैं।
- इमारतों की छतें और खिड़कियाँ इन्हें बसेरा देती हैं।
- गंदगी और खुले में पड़ा खाना इनके लिए भोजन का आसान स्रोत है।
यही वजह है कि अब शहरों में कबूतरों की भीड़ बढ़ती जा रही है और इसके दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं।

कबूतरों से जुड़ी बीमारियाँ
कबूतरों की बीट (गंदगी) और पंखों में कई प्रकार के कीटाणु, बैक्टीरिया और फफूंद पनपते हैं। जब यह सूखकर हवा में उड़ते हैं, तो सांस के जरिए हमारे शरीर में चले जाते हैं और बीमारियाँ पैदा करते हैं।
प्रमुख बीमारियाँ –
- हिस्टोप्लास्मोसिस – एक फंगल संक्रमण जो फेफड़ों को प्रभावित करता है। खांसी, बुखार और थकान इसके लक्षण हैं।
- क्रिप्टोकोकोसिस – कबूतरों की बीट से पनपने वाला फंगस क्रिप्टोकोकस कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों में गंभीर फेफड़ों और दिमाग की बीमारी तक पैदा कर सकता है।
- क्लेमाइडियोसिस – यह बैक्टीरिया से फैलता है, जिससे फ्लू जैसे लक्षण, तेज बुखार और फेफड़ों का संक्रमण होता है।
- एलर्जी और दमा – कबूतरों के पंख और मल में मौजूद सूक्ष्म कण लंबे समय तक सांस के जरिए शरीर में जाकर एलर्जी और दमा पैदा कर सकते हैं। लंबे समय में यह लंग फाइब्रोसिस जैसी जानलेवा बीमारी बन सकता है।
एक सच्ची घटना : पुणे की चेतावनी
पुणे की शीतल विजय शिंदे नामक महिला को लगातार खांसी और सांस लेने में परेशानी रहती थी। कई साल इलाज कराने के बाद डॉक्टरों ने बताया कि यह कबूतरों की बीट से फैला संक्रमण था, जिसने धीरे-धीरे उनके फेफड़ों को खराब कर दिया। आखिरकार जनवरी 2025 में उनकी मृत्यु हो गई।
यह घटना दिखाती है कि कबूतर जनित संक्रमण कोई साधारण समस्या नहीं, बल्कि जीवन के लिए खतरनाक हो सकता है।
कबूतरों की बढ़ती संख्या का असर
- स्वास्थ्य संकट: सबसे ज्यादा असर बुजुर्गों, बच्चों और कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों पर होता है।
- साफ-सफाई की समस्या: कबूतरों की बीट इमारतों, गाड़ियों और सार्वजनिक स्थलों को गंदा कर देती है।
- आर्थिक नुकसान: लगातार सफाई और मरम्मत पर खर्च बढ़ता है।
- पारिस्थितिक असंतुलन: शहरों में इनके झुंड बढ़ने से दूसरे पक्षियों की संख्या कम हो रही है।
क्या करें और क्या न करें
क्या करें
- घर की छत, खिड़कियों और बालकनियों पर जाली (नेट) लगाएँ।
- कबूतरों की बीट नियमित साफ करें, और सफाई करते समय मास्क व दस्ताने पहनें।
- बच्चों और बुजुर्गों को कबूतरों की भीड़ से दूर रखें।
- यदि लंबे समय तक खांसी या सांस लेने में तकलीफ हो, तो तुरंत डॉक्टर से जांच कराएँ।
क्या न करें
- सार्वजनिक जगहों या इमारतों में कबूतरों को दाना न डालें।
- छत या बालकनी पर कबूतरों को घोंसला बनाने न दें।
- कबूतरों की बीट को सूखने न दें, क्योंकि सूखने के बाद यह और खतरनाक हो जाती है।
सामाजिक जिम्मेदारी
- कबूतरों से होने वाली बीमारियों को रोकना सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है।
- नगर निगम को कबूतरों की भीड़ वाले स्थानों पर नियंत्रण करना चाहिए।
- पार्कों और धार्मिक स्थलों पर दाना डालने पर रोक लगाने की ज़रूरत है।
- स्कूलों और समुदायों में स्वास्थ्य शिक्षा कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए।
कबूतर हमारे आस-पास के जीवन का हिस्सा हैं, लेकिन इनकी अनियंत्रित संख्या और गंदगी हमारे लिए गंभीर खतरा बन चुकी है। पुणे की घटना एक चेतावनी है कि यदि हम समय रहते सावधान नहीं हुए, तो ऐसे मामले और बढ़ेंगे। हमें कबूतरों से नफरत करने की नहीं, बल्कि समझदारी से दूरी बनाकर स्वस्थ रहने की ज़रूरत है।
स्वास्थ्य और स्वच्छता के साथ समझौता नहीं
कबूतर हमारे शहरी पारिस्थितिकी का हिस्सा हैं, लेकिन इनकी अनियंत्रित संख्या मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए खतरा बन चुकी है। कबूतरों की बीट से निकलने वाले सूक्ष्म कण न केवल फेफड़ों को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं, बल्कि दीर्घकाल में जीवन के लिए भी खतरनाक साबित हो सकते हैं। इस समस्या के समाधान के लिए सबसे ज़रूरी है कि नागरिक जागरूक बनें, सार्वजनिक स्थलों पर दाना डालने से परहेज़ करें। हमें कबूतरों के साथ सह-अस्तित्व की भावना रखनी चाहिए, लेकिन स्वास्थ्य और स्वच्छता के साथ कोई समझौता नहीं करना चाहिए।
अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर