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डीएसपी के इंटर कास्ट मैरिज के चलते सामाजिक बहिष्कार के मामले में समाज के लोगों को अदालत ने लगाई फटकार, किसी के निजी जीवन में दखल असंवैधानिक की टिप्पणी के साथ समाज की याचिका खारिज

डीएसपी के द्वारा अंतरजातीय विवाह करने पर समाज के लोगों ने उनके परिवार का बहिष्कार कर दिया है। जिसके खिलाफ डीएसपी ने रिपोर्ट दर्ज करवाई। एसडीओपी के द्वारा मामले में बयान के लिए समाज के लोगों को जब बुलाया गया तो समाज के लोगों ने इसे पुलिस प्रताड़ना और एकपक्षीय कार्यवाही बता हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। हाई कोर्ट में मामले में समाज के लोगों को लगाते हुए कहा कि भारत का संविधान सर्वोच्च है और कोई भी व्यक्ति या समूह उसकी मर्यादाओं से ऊपर नहीं है। किसी भी समाज को यह अधिकार नहीं है कि वह तय करें कौन किससे शादी करेगा। विवाह करना व्यक्ति का मौलिक अधिकार और निजी फैसला है। पुलिस के द्वारा बयान के लिए बुलाया जाना जांच प्रक्रिया का हिस्सा है। इसे प्रताड़ना नहीं माना जा सकता। इस टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।

बिलासपुर। अंतरजातीय विवाह करने वाले नक्सल ऑपरेशन में पदस्थ डीएसपी डॉ. मेखलेंद्र प्रताप सिंह को समाजिक रूप से बहिष्कृत करने की कोशिश के मामले में हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। इस मामले में डीएसपी के समाज के लोगों ने याचिका लगाई थी जहां सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने समाज के पदाधिकारियों को न सिर्फ सख्त लहजे में फटकारा, बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया कि भारत का संविधान सर्वोच्च है और कोई भी व्यक्ति या समूह उसकी मर्यादाओं से ऊपर नहीं हो सकता।

डीएसपी डॉ. मेखलेंद्र प्रताप सिंह वर्तमान में कांकेर जिले में नक्सल ऑपरेशन यूनिट में पदस्थ हैं। वे बिलासपुर के सकरी क्षेत्र स्थित आसमा सिटी में निवासरत हैं। कुछ महीने पहले उन्होंने सरगुजा जिले के बरगवा गांव की एक युवती से प्रेम विवाह किया। विवाह अंतरजातीय था। यह विवाह एकतरफा नहीं बल्कि दोनों परिवारों की सहमति से हुआ था। लेकिन विवाह के बाद सतगढ़ तंवर समाज के कुछ पदाधिकारी इस रिश्ते से असहज हो उठे और समाज की एक बैठक बुलाकर डीएसपी एवं उनके परिवार का सामाजिक बहिष्कार करने का निर्णय ले लिया।

बहिष्कार के बाद पुलिस में दर्ज हुई शिकायत:–

सामाजिक बहिष्कार के इस निर्णय से आहत होकर डीएसपी एवं उनके परिजनों ने बेलगहना पुलिस चौकी में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में बताया गया कि समाज के लोगों द्वारा धमकियां दी जा रही हैं, सार्वजनिक रूप से मानहानि की जा रही है और उनके पारिवारिक सम्मान पर आघात पहुंचाया जा रहा है। इस शिकायत पर पुलिस ने मामला दर्ज किया और जांच के लिए कोटा एसडीओपी ने सतगढ़ तंवर समाज के पदाधिकारियों को बयान के लिए बुलाया।

पुलिस कार्रवाई से घबराए समाज के लोग पहुंचे हाईकोर्ट:–

बयान दर्ज करने की प्रक्रिया को समाज के पदाधिकारियों ने “पुलिस प्रताड़ना” बताया और इसे अपनी छवि के विरुद्ध करार देते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर दी। याचिका में कहा गया कि उन्हें अनावश्यक रूप से परेशान किया जा रहा है। पुलिस समाज के निजी मामलों में हस्तक्षेप कर रही है।

हाईकोर्ट ने कहा – “प्राइवेट लाइफ में दखल बर्दाश्त नहीं:”–

इस याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच — मुख्य न्यायाधीश श्री रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति विभु दत्ता गुरु ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा –
“क्या आप लोग संविधान से ऊपर हैं? कोई समाज यह तय नहीं कर सकता कि कौन किससे शादी करेगा। विवाह करना प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है। यह पूरी तरह निजी फैसला है और किसी भी समाज को इसमें हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिस ने यदि बयान के लिए बुलाया है तो वह जांच प्रक्रिया का हिस्सा है। इसमें किसी भी प्रकार की प्रताड़ना नहीं मानी जा सकती, जब तक कि कोई ठोस साक्ष्य न हों।

याचिका को किया सिरे से खारिज:–

कोर्ट ने समाज के पदाधिकारियों की याचिका को सिरे से खारिज कर दिया और उन्हें नसीहत दी कि वे संविधान की मूल भावना को समझें और व्यक्तिगत अधिकारों का सम्मान करें। कोर्ट ने यह भी कहा कि सामाजिक बहिष्कार जैसी परंपराएं लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्थान नहीं रखतीं और यह अमानवीय व असंवैधानिक कृत्य हैं।

सोशल मीडिया पर वायरल हुआ कोर्ट की सुनवाई का वीडियो:–

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी और सुनवाई का वीडियो अब इंटरनेट मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में मुख्य न्यायाधीश को यह कहते हुए सुना जा सकता है —
“आप किसी के पर्सनल लाइफ में कैसे जा सकते हैं? क्या संविधान को ताक पर रख देंगे?”

पुलिस ने दर्ज किया था अपराध, जांच जारी:–

उधर बेलगहना पुलिस द्वारा समाज के पदाधिकारियों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी की जांच अभी भी जारी है। कोटा एसडीओपी की देखरेख में समाज के पदाधिकारियों से पूछताछ की गई है और मामले से जुड़े दस्तावेज एकत्र किए जा रहे हैं। यदि जांच में सामाजिक बहिष्कार और धमकी जैसे आरोप सिद्ध होते हैं तो आगे कड़ी कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

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