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दुनियाभर के लोग यहां मुफ्त में सीख रहे संस्कृत,

निशुल्क शिक्षा,संस्कृत भाषा को बचाने मुहिम

बिलासपुर । एक ऐसी महिला टीचर हैं जो अपने रिटायरमेंट के बाद भी भारत से विलुप्त हो रही भारत की प्रथम संस्कृत भाषा को बचाने में आज भी लगी हुई हैं. रिटायर्ड महिला टीचर पुष्पा दीक्षित अपने घर पर ही देश-विदेश से आए लोगों को संस्कृत भाषा की निःशुल्क शिक्षा देती है. इनसे संस्कृत भाषा सीखने के लिए चीन, अमेरिका और भारत के अलग-अलग राज्यों से लोग यहां आते हैं.

क्या किसी व्यक्ति को अपने पूर्वजों की संस्कृति और भाषा सीखने की ललक उसे हजारों कोस दूर तक ला सकती है। जवाब है हां। ऐसा ही हो रहा है गोंड़पारा के पाणिनीय शोध संस्थान में..जहाँ देश-विदेश सहित भारत के अन्य राज्य दिल्ली बंगलोर की छात्र-छात्रा संस्कृत पढ़ने के लिए बिलासपुर आए हैं। इसके साथ ही भारत के अन्य राज्यो से भी 10 से अधिक बच्चे संस्कृत सीख रहे हैं..इतना ही नही यहाँ बीटेक, एमटेक, पीएचडी होल्डर भी आते हैं संस्कृत पढ़ने…डॉ. दीक्षित उन्हें बिल्कुल मुफ्त में संस्कृत ही नहीं सिखाती बल्कि जीवन जीने का तरीका भी बताती है…उनका घर गुरुकुल की तर्ज पर चलता है जहाँ बच्चे संस्कृति के साथ संस्कृत की शिक्षा ग्रहण कर रहे है।संस्कृत ही भारत और भारतीयता का आधार है..संस्कृत की रक्षा बिना संस्कृति की रक्षा संभव नहीं है.. उसकी रक्षा बिना किसी भी भारतीय भाषा की रक्षा संभव नहीं है..यह कहना है पाणिनीय शोध संस्थान की अध्यक्ष डॉ. पुष्पा दीक्षित का.. उन्होंने संस्कृत की शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से ही वह अपने गोंड़पारा स्थित घर में निशुल्क पाठशाला चला रहीं हैं.. पिछले 20 साल में सैकड़ों बच्चों को उन्होंने संस्कृत की शिक्षा दी.. भारत ही नहीं चीन, नेपाल, अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी जैसे देशों के युवाओं को संस्कृत में पारंगत करने वाली डॉ. दीक्षित का घर ही उनकी पाठशाला है.. अभी संस्थान में 15 बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। इसमें दिल्ली और बंगलोर नेपाल से शामिल हैं। संस्था के द्वारा सभी छात्रों के लिए आवास, भोजन और शिक्षा की व्यवस्था की जाती है। डॉ. दीक्षित चाहती हैं कि लोग पाणिनीय विधि से संस्कृत सीख कर अपने पुरातन संस्कृति, परंपराओं व भारत की रक्षा करने के साथ भारत को विश्वगुरु के तौर पर फिर से स्थापित करें। उन्होंने अब तक संस्कृत व्याकरण, साहित्य कृतियां समेत दूसरी कई कृतियां लिखी हैं।हैरानी की बात ये है कि जहाँ एक तरफ देश-विदेश लोग यहाँ संस्कृत सिख रहे है तो वही ओर छत्तीसगढ़ का कोई भी व्यक्ति आज तक संस्कृत सीखने नही सोध संस्थान नही पहुँचा है दीक्षित जी कहती है ऐसा पिछले 20 सालों में कोई ऐसा व्यक्ति नही जिसने संस्कृत के प्रति रुचि दिखाई हो,ऐसे में अब विलुप्त की कगार पर जाते संस्कृत भाषा को बचाने मुहिम जारी है।

संस्कृत का आनंद सबसे अलग,इसको पढ़ने का मजा कुछ और है

संस्कृत पढ़ने के लिए बाहर से आए छात्र आदित्य कश्यप और छात्रा श्यामा तिवारी के साथ आनंद पांडे का कहना है कि निश्चित ही संस्कृत भाषा कठिन है लेकिन इसको पढ़ने और समझने के बाद इससे सरल और इससे अच्छा सब्जेक्ट कोई भी नहीं है।चूंकि इसका महत्व अभी भी है और कई देशों में इसके जानकर अभी भी है लेकिन पढ़ाने वाला कोई नहीं है।जिसके कारण यहां आना पड़ता है।

वर्जन
संस्कृत अब तक कई देशों के लोगो ने आकर पढ़ा है।संस्कृत को लोग भले ही भूल रहे है लेकिन इसका प्रचलन अभी भी है,अन्य देशों और हमारे देश के कई राज्यों के इसकी बोली अभी भी जारी है।
संस्कृत के बिना ज्ञान अधूरा है।

डॉ पुष्पा दीक्षित अध्यक्ष, शोध संस्थान

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