दोनों पैरों से विकलांग युवती से दुष्कर्म के मामले में 19 साल बाद आरोपित बरी, पीड़िता के पिता के खिलाफ हत्या के मामले में गवाही देने के चलते थे दोनों परिवारों में थी दुश्मनी
दोनों पैरों से पोलियो के चलते विकलांग युवती से रेप के मामले में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को सात साल सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में आरोपी ने अपील की थी। अपील की सुनवाई में पाया गया कि आरोपी ने पीड़िता के पिता के खिलाफ हत्या के मामले में गवाही दी थी इसके अलावा पुलिस में दर्ज एफआईआर और ट्रायल कोर्ट में दर्ज करवाए गए बयान में भी विरोधाभास था। गर्भपात के आरोप लगाए गए थे पर मेडिकल रिपोर्ट में इसकी पुष्टि नहीं हुई। जिस आधार पर ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए सजा रद्द कर दी गईं।
बिलासपुर।बिलासपुर हाईकोर्ट ने महासमुंद जिले के एक युवक के खिलाफ 2005 में दर्ज दुष्कर्म और धमकी के मामले में सुनाई गई सजा से उसे बरी कर दिया। न्यायमूर्ति सचिन सिंह राजपूत की एकलपीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपित की दोषसिद्धि को संदेह से परे सिद्ध नहीं कर सका, इसलिए उसे संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त किया जाता है। कोर्ट ने पाया कि पीड़िता की गवाही में गंभीर विरोधाभास हैं।
एफआइआर में कई बार दुष्कर्म का आरोप थे, जबकि अदालत में केवल एक घटना का उल्लेख है। मेडिकल रिपोर्ट में न तो गर्भपात के निशान मिले और न ही ऐसा प्रमाण कि गर्भधारण कथित कृत्य का परिणाम था। घटना की रिपोर्ट सात महीने देर से दर्ज हुई और इसका कोई संतोषजनक कारण नहीं दिया गया। साथ ही, आरोपित और पीड़िता के पिता के बीच पुरानी दुश्मनी भी सामने आई। इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने कहा कि संदेह का लाभ आरोपित को मिलना चाहिए और उसे सभी आरोपों से मुक्त किया जाता है।
ये है पूरा मामला-
पुलिस रिकार्ड के अनुसार, बसना थानाक्षेत्र की 18 वर्षीय युवती, जो बचपन से दोनों पैरों से पोलियो पीड़ित है, अपने घर में अकेली थी। जनवरी 2005 से लगभग छह महीने पहले करिया उर्फ मालसिंह बिंझवार उसके घर में घुसा और उसके साथ दुष्कर्म किया और धमकाया कि किसी को बताने पर जान से मार देगा। युवती ने आरोप लगाया कि इसके बाद जब भी वह अकेली होती, आरोपित बार-बार जबरन यौन शोषण करता रहा, जिससे वह गर्भवती हो गई। घटना के लगभग सात महीने बाद 10 जनवरी 2005 को पीड़िता ने अपने पिता को जानकारी दी और फिर लिखित शिकायत पुलिस स्टेशन बसना में दर्ज कराई।
ट्रायल कोर्ट ने यह दिया निर्णय-
डाक्टर ने जांच में पीड़िता को करीब 20 सप्ताह (लगभग 5 महीने) का गर्भवती पाया। आरोपित की भी मेडिकल जांच हुई और उसे यौन संबंध बनाने में सक्षम बताया गया। प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश महासमुंद ने 9 सितम्बर 2005 को आरोपित युवक करिया को धारा 376 (दुष्कर्म) में 7 साल सश्रम कारावास और 500 रुपये जुर्माना (जुर्माना न देने पर एक माह अतिरिक्त कारावास) और धारा 506-बी (आपराधिक धमकी) में 3 साल सजा सुनाई।
हाई कोर्ट में ये दीं गईं दलीलें-
आरोपित युवक के वकील कोर्ट में कहा कि, पीड़िता बालिग (लगभग 18 वर्ष) थी और उसकी सहमति से संबंध की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। एफआइआर में सात महीने की देरी संदेह पैदा करती है। पीड़िता के पिता से आरोपित युवक की पुरानी दुश्मनी थी, क्योकि उसने उनकी पहली पत्नी की हत्या मामले में गवाही दी थी। वहीं, पीड़िता की ओर से सरकारी वकील ने कहा कि, पीड़िता विकलांग और असहाय थी, आरोपित ने धमकाकर चुप रहने को मजबूर किया। उसकी गवाही विश्वसनीय है और अकेले उसी के आधार पर दोषसिद्धि हो सकती है।
हाई कोर्ट का विस्तृत विश्लेषण-
न्यायालय ने अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों की गहन समीक्षा करते हुए कई कमियां गिनाईं। जैसे एफआइआर में बार-बार दुष्कर्म का आरोप, जबकि कोर्ट में पीड़िता ने केवल एक घटना बताई। पूछने पर पीड़िता रेप का अर्थ ही स्पष्ट नहीं बता सकी और कहा कि पति-पत्नी के बीच लड़ाई को रेप कहते हैं, जिससे उसकी गवाही की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठता है। पीड़िता ने गर्भपात का आरोप लगाया लेकिन डाक्टर ने न तो गर्भपात और न ही किसी चोट का सबूत पाया। गर्भ 18-20 सप्ताह का पाया गया, जिससे यह निश्चित नहीं हुआ कि वह कथित एकमात्र घटना का परिणाम था। एफआइआर में सात महीने की देरी का कोई संतोषजनक कारण नहीं दिया गया। आरोपित युवक पहले पीड़िता के पिता के खिलाफ उसकी मां की हत्या मामले में गवाही दे चुका था, यह तथ्य झूठे फंसाने की संभावना को बढ़ाता है। इन सब आधारों पर कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष दोष को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा।
कोर्ट ने दिया यह निर्णय-
आरोपित युवक करिया उर्फ माल सिंह को धारा 376 और 506-बी दोनों आरोपों से बरी किया गया। उसकी जमानत की शर्तें भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 481 के तहत छह महीने तक प्रभावी रहेंगी। ट्रायल कोर्ट का 9 सितम्बर 2005 का दोषसिद्धि आदेश निरस्त कर दिया गया।