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कांग्रेस शहर और जिलाध्यक्षों की सूची 4 दिनों में हो सकती है जारी

36 नए चेहरे,5 पुराने नेताओं की वापसी संभव

उदयपुर फॉर्मूला’ भी लागू होगा

बिलासपुर।छत्तीसगढ़ कांग्रेस में लंबे समय से इंतजार की जा रही जिलाध्यक्षों की नई लिस्ट अब जल्द जारी होने वाली है। इसमें ज्यादातर चेहरे नए और गिने चुने पुराने चेहरे रहेंगे।मुश्किल से दो या तीन दिनों में नामो की सूची जारी हो जाएगी।

जानकारी के मुताबिक, 14 नवंबर के बाद कभी भी जिलाध्यक्षों की सूची जारी कर दी जाएगी। छत्तीसगढ़ कांग्रेस के संगठन में इस बार बड़ा फ़ेरबदल भी देखने को मिलेगा। पार्टी के 41 जिलाध्यक्षों (ग्रामीण-शहर मिलाकर) में से केवल 5 पदाधिकारियों को दोबारा मौका मिल सकता है। ये वही हैं जिनकी नियुक्ति करीब छह महीने पहले की गई थी। हालांकि, कई जिलों का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहा, इसलिए उनमें बदलाव तय माना जा रहा है। बाकी 33 जिलों में नए चेहरे सामने आएंगे। कांग्रेस इस बार ‘परफॉर्मेंस बेस्ड सिस्टम’ अपना रही है, जिसके तहत हर छह महीने में जिलाध्यक्षों के काम की समीक्षा होगी। दुर्ग, पाटन, सरगुजा, अंबिकापुर और बलरामपुर के अलावा एक दो जिलों के जिलाध्यक्ष दोबारा बनाए जा सकते हैं।

लागू होगा ‘उदयपुर फॉर्मूला

कांग्रेस संगठन इस बार ‘एक व्यक्ति, एक पद’ नीति को सख्ती से लागू करने जा रही है। उदयपुर चितन शिविर में तय किए गए इस फॉर्मूले के अनुसार, अब एक नेता को केवल एक ही जिम्मेदारी दी जाएगी। इसके साथ ही पार्टी युवाओं, महिलाओं और पिछड़े वर्गों को प्राथमिकता देने की तैयारी में है। नई जिलाध्यक्षों की लिस्ट के साथ छत्तीसगढ़ कांग्रेस का चेहरा बदलने की तैयारी पूरी है,अब बस आधिकारिक घोषणा का इंतजार है।

बिलासपुर और रायपुर में ज्यादातर नेताओं की नजर

प्रदेश के दो जिले महत्वपूर्ण माने जाते है जिसके लिए रायपुर और बिलासपुर को बारीकियों से देखा जा रहा हैं।अब इसमें बनने के लिए नेताओं से एप्रोच और दिल्ली तक जुगाड लगाया गया है।लेकिन किसकी चलेगी यह तो किसी को नहीं पता,बल्कि चर्चा यह जरूर है कि इस बार धमाकेदार और चौंकाने वाला नाम जरूर समाने आएगा।

बिलासपुर कांग्रेस के गढ़ की तलाश, दो दशक की हार के बाद अब संगठन सृजन अभियान से घर वापसी’ की जद्दोजहद

कभी कांग्रेस का अटूट किला माने जाने वाला बिलासपुर अब पार्टी के लिए सबसे कठिन ज़मीन बन गया है। लोकसभा से लेकर विधानसभा तक लगातार हार का सिलसिला कांग्रेस को यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि आखिर संगठन की पकड़ ढीली कहाँ पड़ी। संगठन सृजन अभियान के तहत अब बिलासपुर में नए चेहरे, नई जातीय समीकरण और पुराने गुटों की गांठें सुलझाने की कवायद शुरू हो चुकी है। सवाल यही है क्या यह प्रयोग कांग्रेस को खोया हुआ गढ़ वापस दिला पाएगा.।

20 सालों में बिलासपुर लोकसभा सीट कांग्रेस के हाथ से नहीं लौट सकी

अभिभाजित बिलासपुर संभाग कभी कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था। मध्यप्रदेश के दौर में यह इलाका सत्ता के समीकरण तय करता था, लेकिन छत्तीसगढ़ बनने के बाद से कांग्रेस इस इलाके में लगातार जमीन खोती गई। बीते 20 सालों में बिलासपुर लोकसभा सीट कांग्रेस के हाथ से नहीं लौट सकी। शहर की प्रमुख विधानसभा सीट पर भी भाजपा का वर्चस्व लंबे समय तक कायम रहा अमर अग्रवाल लगातार विधायक बने रहे, हालांकि 2018 में शैलेश पांडे की जीत से कांग्रेस को क्षणिक उम्मीद जरूर जगी थी। मगर ताज़ा चुनावों ने फिर वही संदेश दिया बिलासपुर अब भी कांग्रेस के लिए कठिन इलाका’ बना हुआ है।
अब पार्टी संगठन सृजन अभियान के ज़रिए एक बार फिर अपने गढ़ में घर वापसी की कोशिश में है।

संगठन में बड़े पैमाने पर बदलाव की तैयारी है,शहर और ग्रामीण दोनों जिलाध्यक्षों की नई नियुक्ति, ब्लॉक स्तर पर फेरबदल और जातिगत समीकरणों पर सधी हुई रणनीति।
जातीय संतुलन और समीकरण की जंग
कांग्रेस में इस बार संगठनात्मक नियुक्तियों को लेकर जातिगत संतुलन पर ज़ोर है।

शहर कांग्रेस अध्यक्ष पद सामान्य वर्ग से विशेष रूप से ब्राह्मण समाज से जबकि ग्रामीण अध्यक्ष पद ओबीसी वर्ग से तय

पार्टी सूत्रों के मुताबिक शहर कांग्रेस अध्यक्ष पद सामान्य वर्ग से विशेष रूप से ब्राह्मण समाज से जबकि ग्रामीण अध्यक्ष पद ओबीसी वर्ग से तय माना जा रहा है। सूची किसी भी वक्त जारी हो सकती है।शहर अध्यक्ष पद के लिए सिद्धांशु मिश्रा, महेश दुबे, शैलेश पांडे और राजकुमार तिवारी जैसे नाम चर्चा में हैं। वहीं, यदि ओबीसी वर्ग से चयन हुआ तो विनोद साहू और पूर्व पार्षद शैलेंद्र जायसवाल प्रमुख दावेदार माने जा रहे हैं। ग्रामीण इकाई के लिए सामान्य वर्ग से आशीष सिंह, राजेंद्र शुक्ला, आदित्य दीक्षित और संदीप शुक्ला, जबकि ओबीसी वर्ग से लक्ष्मीनाथ साहू और राजेंद्र साहू के नाम सामने हैं। इसके अलावा कुर्मी समाज से प्रमोद नायक, महिला वर्ग से गीतांजलि कौशिक, जगदीश कौशिक, नीरज जायसवाल और राजेंद्र धीवर भी दौड़ में शामिल बताए जा रहे हैं।एससी वर्ग से प्रेमचंद जायसी और मस्तूरी विधायक दिलीप लहरिया के नामों पर भी चर्चा जारी है। कुल मिलाकर, दो पदों के लिए बीस से अधिक दावेदारों की होड़ ने संगठन के भीतर सक्रियता और सियासी ताप दोनों बढ़ा दिए हैं।

एमपी के नेता उमंग सिंघार का बिलासपुर दौरा और बंद कमरे की बैठकें

मध्यप्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार को इस बार पर्यवेक्षक बनाकर बिलासपुर भेजा गया था। वे तीन दिन तक शहर में रहे और शहर व ग्रामीण संगठन के संभावित चेहरों से बंद कमरे में चर्चा की। उनके समक्ष नेताओं ने अपनी दावेदारी पेश की, स्थानीय समीकरण और पिछले चुनावों की गणित समझाई। सूत्र बताते हैं कि सिंघार ने कई नए नामों को लेकर दिल्ली को रिपोर्ट भेजी है, जिनमें कुछ चौंकाने वाले चेहरे भी शामिल हैं।

विजय केशरवानी का रिकॉर्ड और संगठन का नया मोड़

मौजूदा जिलाध्यक्ष विजय केशरवानी ने सात साल आठ महीने का कार्यकाल पूरा कर रिकॉर्ड बनाया है। भूपेश बघेल सरकार के समय उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उनके कार्यकाल में कांग्रेस ने कई आंदोलन किए जिनमें सबसे उल्लेखनीय रेल रोको आंदोलन था, जहाँ उन्होंने कोटा में ट्रेनें रोककर संगठन को चर्चा में ला दिया था। अब पार्टी एक नए अध्याय की तैयारी में है, जो पुराने संघर्ष और नए नेतृत्व के बीच संतुलन साधने की कोशिश करेगा।
गढ़ वापसी की चुनौती और कांग्रेस की परीक्षा
बिलासपुर की कांग्रेस आज दोहरी चुनौती से गुजर रही है एक तरफ गुटबाजी और जातीय खींचतान, दूसरी तरफ भाजपा का मजबूत संगठनात्मक ढांचा। दिल्ली से लेकर रायपुर तक यह माना जा रहा है कि बिलासपुर में कांग्रेस को अब चेहरा नहीं बल्कि टीम की ज़रूरत है ऐसा नेतृत्व जो जातिगत समीकरणों में भी फिट बैठे और जीत दिलाने की क्षमता भी रखे।
संगठन सृजन अभियान इस दिशा में कांग्रेस की सबसे बड़ी कोशिश है। लेकिन यह प्रयोग कितना असरदार साबित होगा, यह आने वाले महीनों की राजनीतिक तस्वीर तय करेगी।

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