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पक्षियों के संरक्षण हेतु आर्द्रभूमि विकास : एक पारिस्थितिक आवश्यकता

बिलासपुर – पक्षी प्रकृति के सबसे संवेदनशील जैव संकेतक माने जाते हैं। किसी भी क्षेत्र में पक्षियों की विविधता वहाँ की पारिस्थितिक स्थिति, जल-गुणवत्ता और प्राकृतिक संसाधनों की सेहत को दर्शाती है। वर्तमान समय में शहरीकरण, कृषि विस्तार, औद्योगिकीकरण और जलवायु परिवर्तन के कारण प्राकृतिक आर्द्रभूमियाँ तेज़ी से नष्ट हो रही हैं, जिससे पक्षियों के आवास पर गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। ऐसे में पक्षियों के आवास हेतु आर्द्रभूमि का विकास एक अनिवार्य संरक्षण रणनीति बन गई है।

आर्द्रभूमि क्या है?

आर्द्रभूमि वे क्षेत्र हैं जहाँ वर्ष भर या मौसमी रूप से जल उपस्थित रहता है। इनमें तालाब, झील, दलदल, नदी तट, बाढ़ क्षेत्र, जलाशय, मैंग्रोव और कृत्रिम जल निकाय शामिल हैं। ये क्षेत्र जलीय और स्थलीय पारिस्थितिकी के बीच सेतु का कार्य करते हैं।

पक्षियों के लिए आर्द्रभूमि का महत्व

आर्द्रभूमियाँ पक्षियों को बहुआयामी लाभ प्रदान करती हैं—

  • भोजन उपलब्धता : मछलियाँ, कीट, शैवाल, घोंघे, बीज आदि
  • प्रजनन एवं घोंसला निर्माण
  • प्रवासी पक्षियों के लिए विश्राम स्थल
  • शिकारियों से सुरक्षा
  • जलवायु अनुकूलन में सहायक वातावरण

आर्द्रभूमि विकास की आवश्यकता

आज भारत सहित छत्तीसगढ़ में भी अनेक आर्द्रभूमियाँ—

  • अतिक्रमण
  • गाद भराव
  • प्रदूषण
  • जल स्रोतों के सूखने
    के कारण सिकुड़ रही हैं। इससे जलपक्षियों, सारस, बगुले, बतख, टिटहरी और अन्य प्रजातियों का अस्तित्व संकट में है। आर्द्रभूमि विकास से न केवल पक्षियों का संरक्षण होता है बल्कि जल संरक्षण, भू-जल पुनर्भरण और स्थानीय आजीविका भी सुदृढ़ होती है।

पक्षियों के आवास हेतु आर्द्रभूमि विकास की प्रक्रिया

  1. उपयुक्त स्थल का चयन
  • प्राकृतिक या परित्यक्त जल क्षेत्र
  • कम ढाल वाली भूमि
  • मानव हस्तक्षेप न्यूनतम
  • प्रदूषण स्रोतों से दूरी
  1. जल प्रबंधन

पक्षियों की विभिन्न प्रजातियों के अनुसार जल की गहराई आवश्यक होती है—

  • उथला जल (5–30 सेमी) : बगुला, सारस
  • मध्यम गहराई (30–100 सेमी) : बतख, हंस
  • गहरा जल (1–2 मीटर) : डाइविंग पक्षी

मौसमी जल स्तर में उतार-चढ़ाव पक्षियों के लिए लाभकारी होता है।

  1. वनस्पति प्रबंधन

आर्द्रभूमि में संतुलित वनस्पति अत्यंत आवश्यक है—

  • जलीय पौधे : कमल, सिंघाड़ा, हाइड्रिला
  • उभरती वनस्पति : सरकंडा, नरकट
  • तटीय घासें : कांस, दूब

आदर्श रूप से 30–40% क्षेत्र खुला जल और शेष वनस्पति से ढका होना चाहिए।

  1. घोंसला एवं विश्राम स्थल का निर्माण
  • मिट्टी के छोटे द्वीप
  • बाँस या लकड़ी के प्लेटफॉर्म
  • सूखे वृक्षों को संरक्षित रखना

ये संरचनाएँ पक्षियों को सुरक्षित प्रजनन स्थल उपलब्ध कराती हैं।

  1. आहार संसाधनों का विकास
  • कीट एवं जलीय जीवों का प्राकृतिक विकास
  • रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों से परहेज़
  • सीमित मात्रा में देशी मछलियों का संवर्धन
  1. मानव हस्तक्षेप का नियंत्रण
  • शिकार पर पूर्ण प्रतिबंध
  • चारागाह और अतिक्रमण नियंत्रण
  • शांत क्षेत्र की स्थापना

स्थानीय समुदाय की सहभागिता संरक्षण को स्थायी बनाती है।

  • निगरानी एवं प्रबंधन
  • नियमित पक्षी गणना
  • जल गुणवत्ता परीक्षण
  • आक्रामक जलीय पौधों का नियंत्रण
  • दीर्घकालिक प्रबंधन योजना का क्रियान्वयन

नीतिगत एवं सामाजिक पहल

  • रामसर कन्वेंशन के दिशा-निर्देशों का पालन
  • पंचायत, वन विभाग और स्थानीय संस्थाओं की भागीदारी
  • नियंत्रित ईको-टूरिज्म द्वारा जागरूकता

छत्तीसगढ़ के संदर्भ में संभावनाएँ

छत्तीसगढ़ के कोपरा, गंगरेल, मड़मड़ा, बस्तर और सरगुजा क्षेत्र में आर्द्रभूमि विकास से जलपक्षियों का संरक्षण, ग्रामीण रोजगार और पारिस्थितिक संतुलन एक साथ संभव है।

मानव भविष्य की रक्षा का आधार

आर्द्रभूमि विकास केवल जल संरक्षण का कार्य नहीं बल्कि पक्षियों के जीवन, जैव विविधता और मानव भविष्य की रक्षा का आधार है। यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सामुदायिक भागीदारी और सतत प्रबंधन अपनाया जाए तो आर्द्रभूमियाँ पक्षियों के लिए सुरक्षित आश्रयस्थल और प्रकृति के लिए जीवन रेखा बन सकती हैं।
अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर

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