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परिंदों के संरक्षक: बिलासपुर के समाजसेवी चंचल सलूजा का प्रकृति और करुणा से जुड़ा अनोखा योगदान

जब हम किसी मौन प्राणी की प्यास बुझाते हैं, तब हम केवल पानी नहीं, इंसानियत बांटते हैं।”

यही साकार कर दिखाया है बिलासपुर के युवा समाजसेवी चंचल सलूजा ने।

गर्मी के मौसम में एक संवेदनशील पहल

बिलासपुर ।
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर में रहने वाले एक सामान्य युवा चंचल सलूजा ने आज असामान्य सोच और करुणा के भाव से समाज में मिसाल कायम की है। जहां लोग गर्मी से बचने के लिए घरों में बंद रहते हैं, वहीं चंचल उन चुप रहने वाले प्राणियों की चिंता करते हैं जिनकी आवाज़ कोई नहीं सुनता — चिड़ियाँ।

चंचल सलूजा हर साल भीषण गर्मी के दौरान शहर के विभिन्न इलाकों में पेड़ों के नीचे, छतों, बालकनियों और सार्वजनिक स्थानों पर चिड़ियों के लिए मिट्टी के बर्तन में पानी रखते हैं। यह कार्य वे न तो किसी प्रचार के लिए करते हैं, न किसी संस्था के समर्थन से — बल्कि अपने भीतर के इंसानियत की आवाज़ पर।


🐦 चिड़ियों के लिए नहीं बस पानी — यह संवेदना है

चंचल सलूजा मानते हैं कि —

“हमारा जीवन तब ही सार्थक है जब हम उन जीवों की चिंता करें जो खुद के लिए कुछ कह या कर नहीं सकते।”

उन्होंने बताया कि उन्होंने पहली बार यह कार्य 2020 में कोविड काल के दौरान शुरू किया था, जब शहर सुनसान था और उन्हें एक प्यास से छटपटाती चिड़िया दिखी। तभी से हर साल गर्मियों में उन्होंने यह संकल्प लिया कि
“हर उस चिड़िया के लिए पानी हो, जो हमारी छतों पर दाना तो खोजती है, पर कहीं प्यास से न मर जाए।”


🛍️ स्वयं के खर्च से, बिना किसी प्रचार के सेवा

चंचल मिट्टी के परंपरागत पात्र स्वयं खरीदते हैं, उन्हें साफ रखते हैं, और दिन में दो बार पानी भरते हैं। उन्होंने अपनी छत के अलावा आसपास के पेड़ों, दुकानों, मंदिरों और कॉलोनी के सार्वजनिक स्थानों में भी पानी की व्यवस्था की है।
उनके पास कोई एनजीओ नहीं है, न ही वह इस कार्य को दिखावे का नाम देना चाहते हैं।
उनका उद्देश्य सिर्फ एक है — करुणा।


👨‍👩‍👧‍👦 समाज को जागरूक करने की प्रेरणा

आज उनके इस कार्य को देखकर कई अन्य युवाओं और परिवारों ने भी अपने घरों में “पंछियों के प्याऊ” रखना शुरू कर दिया है।
स्कूलों और मोहल्लों में बच्चे उनसे प्रेरणा लेते हैं, और कई जगह अब सामूहिक प्रयास शुरू हो चुके हैं।
उनकी यह पहल “करुणा से क्रांति” की दिशा में एक मौन आंदोलन बनती जा रही है।


🏅 सम्मान नहीं, सहयोग चाहिए

जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें किसी सरकारी या सामाजिक संस्था से पुरस्कार मिला है, तो उनका उत्तर बेहद विनम्र था:

“मुझे चिड़ियों की चहचहाहट ही पुरस्कार लगती है। अगर लोग इस काम को अपनाएँ, वही सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।”


💭 भविष्य की सोच – पर्यावरण व संवेदनशीलता की दिशा में कार्य

चंचल सलूजा अब बच्चों के लिए पर्यावरण शिक्षा, जल संरक्षण, और पक्षियों के संरक्षण पर आधारित स्कूल कैंपेन शुरू करने की योजना बना रहे हैं। वे चाहते हैं कि हर छत्तीसगढ़वासी एक प्याली पानी चिड़ियों के लिए जरूर रखे —
“यह छोटा काम है, पर यह हमें बड़ा इंसान बनाता है।”


📌 निष्कर्ष:

बिलासपुर के चंचल सलूजा जैसे युवा आज के समय में आवश्यकता हैं, क्योंकि वे हमें याद दिलाते हैं कि
“समाज सेवा केवल भाषणों या मंचों तक सीमित नहीं, वह उन मौन क्षणों में छिपी होती है, जहाँ हम किसी बेसहारा की जरूरत पूरी करते हैं।”

उनकी कहानी, उनकी सोच, और उनका कार्य हम सबको प्रेरणा देता है कि
“हम भी अपने घर की छत पर एक पानी की प्याली रखकर परिंदों का धन्यवाद कर सकते हैं, जिनकी चहचहाहट से ही हमारी सुबहें सजती हैं।” हम सबको चाहिए कि हम चंचल सलूजा जैसे कर्मयोगियों के प्रयासों को अपनाएँ, और करुणा के इस पंखों को समाज में फैलाएँ।
एक प्याला पानी — एक जान बचा सकता है।

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