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पहली शादी के अस्तित्व में रहते दूसरी महिला के साथ पति–पत्नी की तरह रहना है अवैध, दूसरी पत्नी और बेटियों को कानूनी वारिस मानने की याचिका खारिज

बिलासपुर।हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि पहली शादी के अस्तित्व में रहते हुए दूसरी महिला के साथ पति-पत्नी की तरह रहने और स्वीकार करने से रिश्ते वैध नहीं हो जाते। एक महिला ने खुद को और दो बेटियों को शादी में उत्तराधिकारी मानने के लिए हाई कोर्ट में याचिका लगाई थी। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में दूसरी पत्नी और बच्चों को कानूनी वारिस मानने से इंकार कर दिया है।


दरअसल बिलासपुर हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें एक महिला और उसकी दो बेटियों ने शहर के प्रतिष्ठित नागरिक को अपना पिता और पति घोषित कराने की मांग की थी। अदालत ने स्पष्ट कहा कि कानून के प्रावधानों के विरुद्ध जाकर किसी अवैध रिश्ते को वैध नहीं ठहराया जा सकता। यह फैसला न्यायमूर्ति रजनी दुबे और न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की खंडपीठ ने सुनाया है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि पहली शादी के अस्तित्व में रहते हुए दूसरी शादी की जाती है, तो वह शून्य मानी जाएगी। साथ ही, बच्चों की पितृत्व घोषणा के मामले में साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के तहत पहले पति को ही कानूनी पिता माना जाएगा, जब तक कि ठोस सबूत इसके विपरीत न हों।

क्या था पूरा मामला-

यह मामला बिलासपुर का है, जहां कु. दुर्गेश नंदनी और संतोषी जांगड़े ने अपनी मां चंद्रकली के साथ मिलकर बृजमोहन दुआ के खिलाफ मुकदमा दायर किया था। उनकी मांग थी कि, चंद्रकली को बृजमोहन दुआ की कानूनी पत्नी घोषित किया जाए। दुर्गेश नंदनी और संतोषी को बृजमोहन की बेटियां (उत्तराधिकारी) माना जाए।

वादी (चंद्रकली) का कहना था कि उसकी शादी 1960 में आत्मप्रकाश से हुई थी, लेकिन वह आध्यात्मिक प्रवृत्ति का था और 1984 में घर छोड़कर चला गया। इस बीच 1971 में चंद्रकली ने बृजमोहन दुआ से वरमाला डालकर शादी कर ली और वे पति-पत्नी की तरह रहने लगे। चौंकाने वाली बात यह थी कि बृजमोहन दुआ ने कोर्ट में खुद स्वीकार किया कि चंद्रकली उनकी पत्नी है और दोनों बेटियां उनकी हैं।

हाईकोर्ट ने क्यों खारिज किया दावा-

जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस अमितेन्द्र किशोर प्रसाद की खंडपीठ ने निचली अदालत (फैमिली कोर्ट) के फैसले को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने अपने फैसले में मुख्य रूप से तीन बातें कहीं:

शादी अवैध:–

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 5(आई) के अनुसार, यदि पति या पत्नी जीवित हैं और तलाक नहीं हुआ है, तो दूसरी शादी कानूनी रूप से अमान्य है। चूंकि चंद्रकली और आत्मप्रकाश का तलाक नहीं हुआ था, इसलिए बृजमोहन के साथ उनकी शादी की कोई कानूनी अहमियत नहीं है।

सरकारी दस्तावेजों का महत्व:–

कोर्ट ने पाया कि आधार कार्ड और अन्य सरकारी दस्तावेजों में आज भी बेटियों के पिता के नाम के रूप में आत्मप्रकाश का ही उल्लेख है।

पितृत्व का कानून:–

कानून यह मानता है कि शादी के दौरान पैदा हुए बच्चे उसी पति के माने जाएंगे जिससे महिला की वैध शादी हुई है। कोर्ट ने कहा कि केवल बृजमोहन के स्वीकार कर लेने से कानून नहीं बदल जाता।

फैमिली कोर्ट का फैसला बरकरार रखा-

अदालत ने माना कि यह मुकदमा संपत्ति के विवाद से जुड़ा था। कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि वैधानिक प्रावधानों को केवल आपसी सहमति या बयानों से दरकिनार नहीं किया जा सकता। इस फैसले के बाद अब अपीलकर्ताओं को बृजमोहन दुआ की संपत्ति या नाम पर कानूनी हक नहीं मिल सकेगा।

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि मामले में सभी साक्ष्यों और कानूनी प्रावधानों का सही मूल्यांकन किया गया है। इसलिए अपील में कोई दम नहीं है।

नहीं दिया जा सकता पत्नी व बेटी का दर्जा-

हाईकोर्ट ने अपील खारिज करते हुए कहा कि, दुर्गेश नंदनी और संतोषी जांगड़े को ब्रजमोहन दुआ की बेटियां घोषित नहीं किया जा सकता और चंद्रकली को उनकी पत्नी का दर्जा नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि, भले ही ब्रजमोहन दुआ ने उन्हें अपनी बेटियां स्वीकार किया हो, लेकिन कोई भी स्वीकारोक्ति कानून के खिलाफ जाकर रिश्ते नहीं बना सकती।

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