बढ़ता तापमान बदल रहा है जंगलों का कैलेंडर, तेंदू-महुआ के फलन पर संकट

वन आधारित आजीविका और वन्यजीवों की खाद्य श्रृंखला पर खतरा
बिलासपुर – इस वर्ष तापमान में असामान्य वृद्धि और वर्षा के अनियमित वितरण के कारण जंगलों की पारिस्थितिकी में महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई देने लगे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका सीधा प्रभाव तेंदू, महुआ और साल जैसे महत्वपूर्ण वन वृक्षों पर पड़ सकता है।
वन क्षेत्रों में नई पत्तियों के निकलने की प्रक्रिया जारी है, लेकिन उनकी संख्या और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। विशेष रूप से तेंदू के वृक्षों में पत्तियों और फलन की गुणवत्ता कमजोर पड़ सकती है। इसी प्रकार महुआ और साल में भी पुष्पन और फलन चक्र पर असर पड़ने की संभावना व्यक्त की जा रही है।
वन आधारित आजीविका के लिए भी यह स्थिति चुनौतीपूर्ण बन सकती है। पिछले दो वर्षों से सूखे दिनों की अवधि बढ़ने और वर्षा के अनियमित वितरण ने जंगलों की नमी संतुलन को प्रभावित किया है। इसके कारण कमजोर पुष्पन, कम फलन और प्राकृतिक पुनर्जनन में गिरावट जैसे प्रभाव सामने आ सकते हैं।
पुष्पन एवं फलन में स्पष्ट बदलाव
तापमान में वृद्धि, वर्षा का अनियमित वितरण, मिट्टी में नमी की कमी और सूखे दिनों की अवधि में बढ़ोतरी—ये चार प्रमुख कारण जंगलों की फेनोलॉजी (पौधों के जीवन चक्र की मौसमी घटनाएँ) को प्रभावित कर रहे हैं।
कई प्रजातियों में सामान्य समय से तीन से चार दिन पहले पुष्पन के संकेत देखे जा रहे हैं। इससे परागण की प्रक्रिया बाधित होने की आशंका बढ़ जाती है, क्योंकि परागण करने वाले कीट और पक्षियों का समय चक्र अभी भी पुराने पैटर्न पर आधारित रहता है। परिणामस्वरूप फल और बीज उत्पादन में कमी आ सकती है।
इन वृक्षों में गहरा प्रभाव
अनियमित वर्षा और बढ़ते तापमान का सबसे पहला असर तेंदू के वृक्षों में देखा जा सकता है। नई पत्तियाँ तो निकलेंगी, लेकिन उनकी गुणवत्ता कमजोर रहने की संभावना है। फल उत्पादन में लगभग 20–25 प्रतिशत तक गिरावट की आशंका व्यक्त की जा रही है।
महुआ के वृक्षों में अभी पुष्पन का समय है, लेकिन कई क्षेत्रों में फूल कमजोर दिखाई दे रहे हैं, जबकि कुछ स्थानों पर पुष्पन के संकेत भी कम मिल रहे हैं। ऐसे में तापमान बढ़ने की स्थिति में फूल जल्दी गिर सकते हैं और उनकी गुणवत्ता भी प्रभावित हो सकती है।
साल के वृक्ष भी इस वर्ष कम पुष्पन की स्थिति से गुजर सकते हैं, जिसके कारण फलन और बीज उत्पादन में कमी की संभावना है।
वन्यजीवों पर भी पड़ेगा असर
पुष्पन और फलन के समय चक्र में बदलाव का असर केवल कृषि और वन आधारित आजीविका तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वन्यजीवों की खाद्य आपूर्ति श्रृंखला पर भी पड़ेगा।
भालू, बंदर और चमगादड़ जैसे जीव महुआ फूलों पर निर्भर रहते हैं। यदि महुआ का पुष्पन कमजोर होता है, तो इन्हें भोजन की तलाश में अधिक दूरी तय करनी पड़ सकती है। इसी प्रकार हिरण और जंगली सुअर साल के बीजों की कमी के कारण अन्य खाद्य स्रोतों की खोज करेंगे।
गिलहरी और कई पक्षी प्रजातियाँ चिरौंजी जैसे वन उत्पादों पर निर्भर रहती हैं, इसलिए इनके लिए भी भोजन की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
“जलवायु परिवर्तन से बदल रहा है जंगलों का प्राकृतिक चक्र”
वानिकी वैज्ञानिक अजीत विलियम्स के अनुसार, बढ़ता तापमान और वर्षा का असंतुलित वितरण जंगलों के प्राकृतिक जीवन चक्र को प्रभावित कर रहा है। इसका सबसे स्पष्ट प्रभाव फेनोलॉजी में बदलाव के रूप में दिखाई दे रहा है, जहाँ कई वृक्ष प्रजातियों में पुष्पन और पत्तियों के निकलने का समय बदल रहा है।
उनका कहना है कि यदि यह प्रवृत्ति जारी रहती है तो तेंदू, महुआ और साल जैसे आर्थिक एवं पारिस्थितिक दृष्टि से महत्वपूर्ण वृक्षों के फलन और बीज उत्पादन पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है। इससे न केवल वन पारिस्थितिकी प्रभावित होगी बल्कि वन आधारित आजीविका और वन्यजीवों की खाद्य श्रृंखला पर भी दबाव बढ़ेगा।