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बस्तर के 4 हजार सहायक आरक्षकों और डीएसएफ जवानों को पुलिस आरक्षकों के समान सुविधा और वेतनमान की मांग के लिए लगी जनहित याचिका खारिज

बस्तर में कार्यरत 4 हजार से अधिक सहायक आरक्षकों और डीएसएफ जवानों को पुलिस आरक्षकों के समान सुविधा और वेतनमान दिलाने के लिए संयुक्त पुलिस कर्मचारी एवं परिवार कल्याण संघ के द्वारा लगाई गई जनहित याचिका खारिज कर दी गई है। अदालत ने इसे जनहित याचिका नहीं मानते हुए सर्विस मैटर माना है। हालांकि याचिकाकर्ता को इस बात की लिबर्टी दी गई है कि वह सर्विस मैटर के रूप में यह याचिका फिर से दायर कर सकते हैं।

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बस्तर के सहायक आरक्षकों और डिस्ट्रिक्ट स्ट्राइक फोर्स (डीएसएफ) जवानों की सुविधाओं, वेतन और पदोन्नति को लेकर दायर जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। संयुक्त पुलिस कर्मचारी एवं परिवार कल्याण संघ की ओर से दायर इस याचिका पर चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस बीडी गुरु की डिवीजन बेंच ने सुनवाई करते हुए कहा कि यह जनहित याचिका नहीं है, बल्कि यह सर्विस मैटर है।

याचिका में क्या था:–

याचिका में बताया गया कि प्रदेश मंत्रिमंडल के निर्णयानुसार सहायक आरक्षक के पद को समाप्त कर डीएसएफ (डिस्ट्रिक्ट स्ट्राइक फोर्स) बनाने की अनुशंसा की गई थी। इसके तहत लगभग 2700 सहायक आरक्षकों को डीएसएफ में शामिल किया गया, लेकिन शेष हजारों जवान अब भी इसके लिए प्रतीक्षा कर रहे हैं। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि उन्हें तत्काल डीएसएफ बनाया जाना चाहिए था।

याचिका में यह भी कहा गया कि
जिन सहायक आरक्षकों को डीएसएफ बनाया गया है, उन्हें जिला पुलिस बल के आरक्षकों के बराबर वेतन और सुविधाएं नहीं दी जा रही हैं। डीएसएफ जवानों के परिजनों को अनुकंपा नियुक्ति का लाभ नहीं मिल रहा है। गोपनीय सैनिक लंबे समय से अपनी जान जोखिम में डालकर सेवा दे रहे हैं, लेकिन उन्हें अब तक आरक्षक नहीं बनाया गया है।

जोखिम के बावजूद समानता से वंचित:–

याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि सहायक आरक्षक और डीएसएफ जवान पुलिस आरक्षकों की तरह ही जोखिमभरे हालात में ड्यूटी करते हैं। उनसे पूरे काम लिए जाते हैं, लेकिन उन्हें समान सुविधाएं नहीं मिलतीं। यही स्थिति गोपनीय सैनिकों की है, जो कई वर्षों से सेवा में हैं और अब भी आरक्षक बनने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

हाईकोर्ट का फैसला:–

हाईकोर्ट ने सभी दलीलों पर विचार करने के बाद यह स्पष्ट किया कि यह मामला जनहित याचिका का विषय नहीं है। अदालत ने कहा कि यह पूरी तरह से सर्विस मैटर है और इस पर निर्णय संबंधित सेवा नियमों और प्रशासनिक प्रक्रिया के अंतर्गत ही लिया जा सकता है। इसी आधार पर अदालत ने संयुक्त पुलिस कर्मचारी एवं परिवार कल्याण संघ की याचिका को खारिज कर दिया। याचिकाकर्ता को अदालत ने लिबर्टी दी है कि वह सर्विस मैटर के रूप में इस याचिका को फिर से लगा सकते हैं।

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