बोहार भाजी : संरक्षण नहीं हुआ तो दुर्लभ हो जाएगी यह अनमोल वन संपदा

बढ़ती कीमतें दे रहीं गंभीर चेतावनी
बिलासपुर — छत्तीसगढ़ की पारंपरिक वन संस्कृति और पोषण परंपरा से जुड़ी बोहार भाजी आज दुर्लभता की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। कभी वन क्षेत्रों और ग्रामीण बाजारों में सहज उपलब्ध रहने वाली यह वन सब्जी अब तेजी से महंगी होती जा रही है। पिछले वर्ष जहां इसकी कीमत 230 से 250 रुपए प्रति किलोग्राम थी, वहीं इस वर्ष कई बाजारों में यह 300 रुपए से आगे निकल चुकी है और कुछ स्थानों पर 400 रुपए प्रति किलोग्राम तक पहुंच रही है।
यह बढ़ती कीमत केवल मांग का परिणाम नहीं बल्कि प्राकृतिक संसाधन के तेजी से घटते आधार का संकेत है। बोहार भाजी के वृक्ष अब छत्तीसगढ़ में सीमित क्षेत्रों तक सिमटते जा रहे हैं।

दुर्लभ और सीमित अवधि की वन सब्जी
बोहार भाजी छत्तीसगढ़ की अत्यंत दुर्लभ, महंगी तथा लोकप्रिय औषधीय वन सब्जियों में गिनी जाती है। यह वर्ष भर उपलब्ध नहीं रहती बल्कि मुख्य रूप से गर्मियों के मौसम में मार्च से मई के बीच सीमित अवधि के लिए ही बाजार में दिखाई देती है।
यह खेतों में उगाई जाने वाली फसल नहीं है, बल्कि ऊँचे बोहार वृक्षों पर प्राकृतिक रूप से विकसित होती है। इसकी कोमल पत्तियाँ और कलियाँ फूल बनने से पहले ही तोड़ ली जाती हैं और इन्हीं का उपयोग सब्जी के रूप में किया जाता है। यही कारण है कि इसका उत्पादन सीमित रहता है और उपलब्धता प्राकृतिक वनों पर निर्भर करती है।
अन्य नाम और पहचान
परंपरागत रूप से इसे हिंदी में लसोड़ा, गूंझा अथवा भोकर जैसे नामों से भी जाना जाता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह बर्ड लाइम ट्री या इंडियन चेरी के रूप में पहचानी जाती है। विभिन्न क्षेत्रों में नाम भिन्न होने के बावजूद इसका उपयोग और महत्व समान रूप से स्वीकार किया गया है।
सीमित होता प्राकृतिक विस्तार
कभी प्रदेश के अधिकांश वन क्षेत्रों में पाए जाने वाले बोहार वृक्ष अब मुख्यतः गरियाबंद, मैनपुर, मुंगेली, मरवाही, बस्तर तथा सरगुजा के वनांचलों तक सीमित रह गए हैं। इन क्षेत्रों से भी वृक्षों की संख्या घटने की जानकारी लगातार सामने आ रही है।
यदि यही स्थिति बनी रही तो यह अनमोल प्रजाति संकटग्रस्त वृक्षों की श्रेणी में शामिल हो सकती है।
इसलिए अनमोल है बोहार भाजी
बोहार केवल एक वनस्पति नहीं बल्कि बहुउपयोगी पारंपरिक वन संपदा है। इसकी पत्तियां, फल और छाल विभिन्न उद्देश्यों के लिए उपयोग में लाई जाती हैं। विशेष रूप से इसकी पत्तियां उच्च पोषण मूल्य के कारण आदिवासी और ग्रामीण भोजन प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा रही हैं।
वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार इसमें —
- विटामिन ए और विटामिन सी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
- आयरन, फास्फोरस और डाइटरी फाइबर पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होते हैं।
- एंटीऑक्सीडेंट गुण रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक होते हैं।
अपने विशिष्ट स्वाद और औषधीय गुणों के कारण इसे छत्तीसगढ़ की सबसे मूल्यवान भाजी माना जाता है।
औषधीय महत्व
पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक पोषण विज्ञान दोनों इसके औषधीय महत्व को रेखांकित करते हैं —
- आयरन की उपलब्धता एनीमिया की रोकथाम में सहायक।
- कैल्शियम एवं फास्फोरस हड्डियों और दांतों को मजबूत बनाते हैं।
- फाइबर पाचन तंत्र को सुधारता है और कब्ज से राहत देता है।
- रक्त शर्करा नियंत्रण में सहायक होने से मधुमेह प्रबंधन में उपयोगी।
- पत्तियों का लेप त्वचा रोगों में लाभकारी माना जाता है।
इस प्रकार यह प्रजाति पोषण सुरक्षा और पारंपरिक स्वास्थ्य प्रणाली दोनों से जुड़ी हुई है।
संकट के प्रमुख कारण
बोहार वृक्षों के तेजी से घटने के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं —
- अवैध एवं अनियंत्रित कटाई
- खनिज उत्खनन गतिविधियों का विस्तार
- योजनाबद्ध पौधरोपण कार्यक्रमों में उपेक्षा
- प्राकृतिक पुनर्जनन का अभाव
विशेष चिंता का विषय यह है कि अभी तक बड़े स्तर के वृक्षारोपण कार्यक्रमों या कृषि-वानिकी योजनाओं में इसे पर्याप्त स्थान नहीं मिल सका है।
संरक्षण ही एकमात्र विकल्प
बोहार भाजी केवल एक पारंपरिक वन उत्पाद नहीं बल्कि पोषण सुरक्षा, औषधीय उपयोग, जैव विविधता संरक्षण और स्थानीय आजीविका से जुड़ी अत्यंत महत्वपूर्ण प्रजाति है। प्राकृतिक वनों में इसके घटते वृक्ष गंभीर चेतावनी हैं।
आवश्यक कदम —
- समुदाय आधारित संरक्षण मॉडल विकसित किए जाएं।
- नर्सरी उत्पादन और गुणवत्तापूर्ण पौध तैयार किए जाएं।
- कृषि-वानिकी प्रणालियों में इसे शामिल किया जाए।
- स्थानीय स्तर पर बीज संग्रह और रोपण अभियान चलाए जाएं।
- खनन क्षेत्रों में प्रतिपूरक पौधरोपण में प्राथमिकता दी जाए।
यदि शीघ्र ही संरक्षण और संवर्धन की दिशा में ठोस प्रयास नहीं किए गए तो आने वाले वर्षों में बोहार भाजी दुर्लभ श्रेणी में पहुंच सकती है और इसकी उपलब्धता आम लोगों की पहुंच से बाहर हो सकती है।
अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर