रामसर मान्यता के पश्चात आर्द्रभूमि प्रबंधन की चुनौतियां एवं अवसर

बिलासपुर – छत्तीसगढ़ राज्य के बिलासपुर जिले के तखतपुर विकासखंड में स्थित कोपरा जलाशय आज केवल एक जल संरचना नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि के रूप में उभरती हुई प्राकृतिक धरोहर है। राज्य की पहली अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त आर्द्रभूमि के रूप में यह स्थल पारिस्थितिकी संरक्षण, जल सुरक्षा, जैव विविधता संवर्धन तथा ग्रामीण आजीविका के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

रामसर मान्यता किसी भी आर्द्रभूमि के लिए केवल प्रतिष्ठा का प्रतीक नहीं होती, बल्कि यह संरक्षण, विवेकपूर्ण उपयोग तथा दीर्घकालिक पारिस्थितिक प्रबंधन का वैश्विक दायित्व भी निर्धारित करती है। इसलिए कोपरा जलाशय को एक आदर्श मॉडल आर्द्रभूमि के रूप में विकसित करने हेतु वैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक तथा नीतिगत स्तर पर समन्वित प्रयास आवश्यक हैं।

पारिस्थितिक महत्व एवं जैव विविधता संरक्षण
कोपरा जलाशय जलीय तथा तटीय पारिस्थितिक तंत्रों का अद्वितीय संगम प्रस्तुत करता है। यहाँ विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक प्रक्रियाएँ एक साथ संचालित होती हैं, जो क्षेत्रीय पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

इस आर्द्रभूमि में—
- देशी एवं प्रवासी पक्षियों की अनेक प्रजातियाँ शीतकालीन प्रवास के दौरान निवास करती हैं।
- विभिन्न प्रकार की मछलियाँ, उभयचर, सरीसृप तथा जलीय जीव समुदाय पाए जाते हैं।
- जलकुंभी, कास, नलखाद तथा अन्य जलीय वनस्पतियाँ पोषक तत्व चक्रण में सहायक होती हैं।
- यह प्राकृतिक रूप से जल शुद्धीकरण, भूजल पुनर्भरण तथा बाढ़ नियंत्रण जैसी पारिस्थितिकी सेवाएँ प्रदान करती है।
आवश्यक संरक्षण उपाय
- प्रतिवर्ष पक्षी गणना एवं जैव विविधता आकलन कार्यक्रम।
- संकटग्रस्त प्रजातियों हेतु संरक्षित मूल क्षेत्र (कोर क्षेत्र) का निर्धारण।
- बाह्य आक्रामक वनस्पति एवं जीव प्रजातियों का नियंत्रण।
- जल गुणवत्ता की नियमित जाँच—अम्लीयता स्तर, घुलित ऑक्सीजन, जैव रासायनिक ऑक्सीजन मांग तथा पोषक तत्व भार का मूल्यांकन।
यदि दीर्घकालिक वैज्ञानिक निगरानी प्रणाली विकसित की जाए तो यह स्थल राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय शोध गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन सकता है।
जल संतुलन एवं जल संसाधन प्रबंधन
किसी भी आर्द्रभूमि का अस्तित्व उसके जल पर निर्भर करता है। जल स्तर में उतार-चढ़ाव, तलछट संचयन तथा पोषक तत्वों की अधिकता पारिस्थितिकी संतुलन को प्रभावित कर सकती है।
प्रमुख रणनीतियाँ
- जलग्रहण क्षेत्र उपचार योजना लागू करना।
- ऊपरी कृषि क्षेत्रों से रासायनिक अपवाह को नियंत्रित करना।
- वर्षा जल संचयन एवं भूजल पुनर्भरण संरचनाओं का निर्माण।
- वैज्ञानिक आधार पर तलछट निष्कासन योजना तैयार करना।
संतुलित जल प्रवाह और स्वच्छ जल गुणवत्ता इस आर्द्रभूमि की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए अनिवार्य है।
प्रदूषण नियंत्रण एवं भूमि उपयोग प्रबंधन
तेजी से बढ़ते शहरी विस्तार तथा कृषि तीव्रता के कारण आर्द्रभूमियाँ प्रदूषण और अतिक्रमण के दबाव में आ रही हैं। यदि समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया तो जलाशय की पारिस्थितिक क्षमता प्रभावित हो सकती है।
आवश्यक कदम
- सीवेज तथा ठोस अपशिष्ट के प्रत्यक्ष जल निर्वहन पर पूर्ण प्रतिबंध।
- परिधीय संरक्षित क्षेत्र (बफर क्षेत्र) का निर्धारण।
- हरित पट्टी विकसित कर प्राकृतिक अवरोध तैयार करना।
- अवैध भूमि परिवर्तन एवं अतिक्रमण पर कठोर निगरानी।
- रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर जैविक खेती को प्रोत्साहन।
नीति स्तर पर इसे “सार्वजनिक प्राकृतिक संपदा” घोषित करना संरक्षण प्रयासों को मजबूत आधार प्रदान कर सकता है।
स्थानीय समुदाय की सहभागिता
आर्द्रभूमि संरक्षण केवल प्रशासनिक प्रयासों से संभव नहीं है। स्थानीय समुदाय की सक्रिय भागीदारी इसकी सफलता की कुंजी है।
- मछुआरा समुदाय, किसान एवं ग्रामीणों को संरक्षण कार्यक्रमों में सहभागी बनाना।
- पक्षी अवलोकन, पारंपरिक मत्स्य पालन तथा प्रकृति पर्यटन जैसे टिकाऊ आजीविका विकल्प विकसित करना।
- ग्राम स्तर पर आर्द्रभूमि प्रबंधन समितियों का गठन।
- विद्यालयों एवं ग्राम सभाओं के माध्यम से पर्यावरण जागरूकता अभियान।
जब समुदाय स्वयं संरक्षण का भागीदार बनता है, तब संसाधन दीर्घकाल तक सुरक्षित रहते हैं।
प्रबंधन योजना एवं नीतिगत समर्थन
एक प्रभावी आर्द्रभूमि प्रबंधन योजना में निम्न तत्व शामिल होने चाहिए—
- क्षेत्रीय विभाजन — मूल क्षेत्र, संरक्षण परिधि तथा संक्रमण क्षेत्र।
- जोखिम मूल्यांकन एवं खतरा विश्लेषण।
- दीर्घकालिक निगरानी प्रणाली।
- स्पष्ट बजट व्यवस्था एवं उत्तरदायी संस्थाओं की भूमिका।
वन विभाग, स्थानीय प्रशासन, पंचायती राज संस्थाएँ तथा शोध संस्थान मिलकर समन्वित प्रबंधन ढांचा विकसित कर सकते हैं। विशेष रूप से बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर जैसे संस्थानों की वैज्ञानिक भागीदारी इस दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।
अनुसंधान, शिक्षा एवं प्रकृति आधारित पर्यटन
कोपरा जलाशय को “जीवंत प्रयोगशाला” के रूप में विकसित किया जा सकता है—
- विश्वविद्यालयों के लिए क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र।
- पक्षी अवलोकन मीनार, व्याख्या केंद्र एवं प्रकृति पथ का निर्माण।
- विद्यार्थियों के लिए क्षेत्र अध्ययन एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम।
नियंत्रित एवं पर्यावरण अनुकूल पर्यटन स्थानीय अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करते हुए संरक्षण जागरूकता बढ़ा सकता है।
जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में महत्व
वर्तमान समय में आर्द्रभूमियाँ जलवायु परिवर्तन से निपटने के प्राकृतिक समाधान के रूप में उभर रही हैं।
कोपरा जलाशय—
- स्थानीय सूक्ष्म जलवायु को संतुलित करता है।
- सूखा एवं बाढ़ जैसी चरम परिस्थितियों के प्रभाव को कम करता है।
- कार्बन संचयन द्वारा वातावरणीय कार्बन को कम करने में योगदान देता है।
इस दृष्टि से इसे जलवायु सहनशील आर्द्रभूमि मॉडल के रूप में विकसित किया जा सकता है।
छत्तीसगढ़ की इस महत्वपूर्ण आर्द्रभूमि का विकास केवल संरक्षण कार्यक्रम नहीं, बल्कि प्रकृति, समाज और अर्थव्यवस्था के बीच संतुलन स्थापित करने की प्रक्रिया है।
यदि—
- वैज्ञानिक प्रबंधन,
- सामुदायिक सहभागिता,
- मजबूत नीति समर्थन,
- सतत निगरानी एवं अनुसंधान
इन सभी को समन्वित रूप से लागू किया जाए, तो कोपरा जलाशय न केवल राज्य बल्कि पूरे देश के लिए एक आदर्श आर्द्रभूमि मॉडल बन सकता है।
अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर