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राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम में सेंट्रल यूनिवर्सिटी के मंच से विषय से भटक खुद की कहानी सुनाने लगे कुलपति, मुद्दे पर लौटने के लिए कहा तो अतिथि को सभा से भगाया, देशभर से आए कई साहित्यकारों ने कार्यक्रम का किया बहिष्कार

बिलासपुर ।गुरु घासीदास सेंट्रल यूनिवर्सिटी द्वारा आयोजित राष्ट्रीय साहित्य परिसंवाद कार्यक्रम के दौरान जीजीयू के मंच से कुलपति के आचरण को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। मुख्य विषय को छोड़कर कुलपति आलोक अग्रवाल अपना जीवन अनुभव और उपलब्धियां गिनाने लगे। जब एक अतिथि ने मुख्य विषय पर लौटने की का आग्रह किया तो उन्हें आयोजन से कुलपति ने भगा दिया। कार्यक्रम में कई राज्यों के साहित्यकार शामिल थे। उन्होंने कुलपति के रवैये को अनुचित बताते हुए कार्यक्रम का बहिष्कार कर दिया।

दरअसल गुरु घासीदास सेंट्रल यूनिवर्सिटी के कुलपति आलोक चक्रवाल का गरिमाहीन और अमर्यादित आचरण सामने आया है। यहां कार्यक्रम के दौरान एक अतिथि को कुलपति ने अपमानित कर बाहर जाने को कह दिया। वजह सिर्फ इतनी थी कि मुख्य विषय छोड़कर कुलपति अपनी जीवन गाथा सुनाने लग गए थे। जब अतिथि ने मुख्य मुद्दे पर लौटने का निवेदन किया तो कुलपति आलोक चक्रवाल भड़क गए और अमर्यादित व्यवहार करते हुए अतिथि को कार्यक्रम छोड़कर जाने के लिए कह दिया। इस दौरान एक अन्य अतिथि ने जब निवेदन करते हुए कुलपति से ऐसा ना करने का आग्रह किया और कहा कि आपके द्वारा ही आमंत्रित अतिथि हैं तो कुलपति ने दो टूक कह दिया कि “यदि आपको भी तकलीफ है तो आप भी निकल जाइए, हमने आमंत्रित किया है तो हम जाने के लिए भी कह रहे हैं। विभाग बढ़ने पर दर्जन पर अतिथि और कई प्रोफेसर कार्यक्रम बीच में छोड़ बाहर निकल गए। कुलपति के इस घमंड भरे गरिमाहीन आचरण का वीडियो भी सामने आया है।

गुरु घासीदास सेंट्रल यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग में आयोजित राष्ट्रीय परिसंवाद के दौरान बुधवार को बड़ा विवाद हो गया। साहित्य अकादमी, नई दिल्ली और विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में “समकालीन हिंदी कहानी: बदलते जीवन संदर्भ” विषय पर कार्यक्रम चल रहा था। देश के विभिन्न राज्यों— भोपाल, महाराष्ट्र, ओडिशा सहित कई जगहों से साहित्यकार और प्रोफेसर इसमें शामिल हुए थे। कार्यक्रम के बीच कुलपति प्रोफेसर आलोक चक्रवाल अपने जीवन के अनुभव और उपलब्धियों का जिक्र करने लगे। इस पर महाराष्ट्र से आए साहित्यकार मनोज रूपण ने विनम्रता से कहा कि यदि चर्चा कार्यक्रम के विषय पर केंद्रित हो, तो बेहतर रहेगा। बस, यहीं से माहौल बिगड़ गया। कुलपति चक्रवाल ने सख्त लहजे में पूछा— “आपका नाम क्या है?” नाम बताने पर वे नाराज हो गए और कहा— “आपकी यहाँ जरूरत नहीं है, तुरंत बाहर जाइए।” कुलपति ने आगे कहा कि वाइस चांसलर से बात करने का तरीका सीखिए, और संयोजकों को निर्देश दिया कि इन्हें आगे कभी न बुलाया जाए। खुले मंच पर हुई इस नोकझोंक से सभागार का माहौल गर्म हो गया। कई अतिथि असहज हो गए और कार्यक्रम बीच में ही छोड़कर निकल गए। दूसरे राज्यों से आए साहित्यकारों ने इसे “अनुचित” बताते हुए कार्यक्रम का बहिष्कार कर दिया। अकादमिक मंच पर संवाद की जगह विवाद हावी हो गया।

पूरे वाक्ये में कुलपति आलोक चक्रवाल खुद को सही और मुख्य मुद्दे पर लौटने के लिए कहने वाले अतिथि को ही गलत ठहराते रहे और अतिथि देवों भव के भारतीय संस्कृति को ठेंगा दिखाते रहे। उधर, विश्वविद्यालय के कुछ प्रतिभागियों का कहना था कि मतभेद को शांतिपूर्वक सुलझाया जा सकता था। विवाद के कारण परिसंवाद का फोकस विषय से भटक गया और शेष सत्रों पर भी असर पड़ा। घटना के बाद कैंपस में दिनभर चर्चा चलती रही कि प्रतिष्ठित मंच पर इस तरह का टकराव विश्वविद्यालय की गरिमा के अनुकूल नहीं है। अब इसका एक वीडियो भी वायरल हो रहा है।

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