विश्व मौसम विज्ञान दिवस 2025: सामूहिक रूप से प्रारंभिक चेतावनी अंतर को पाटना” प्रासंगिकता और वानिकी क्षेत्र में इसकी भूमिका

बिलासपुर – हर साल 23 मार्च को विश्व मौसम विज्ञान दिवस मनाया जाता है, जो जलवायु, मौसम और पर्यावरणीय परिवर्तनों के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाने के लिए समर्पित है। वर्ष 2025 का थीम “सामूहिक रूप से प्रारंभिक चेतावनी अंतर को पाटना” अत्यंत प्रासंगिक है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता लगातार बढ़ रही है।

वन और पारिस्थितिकीय तंत्र जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, और यदि प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली को मजबूत किया जाए, तो न केवल प्राकृतिक आपदाओं से नुकसान को कम किया जा सकता है, बल्कि वन पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा और सतत प्रबंधन भी सुनिश्चित किया जा सकता है।

जलवायु परिवर्तन और आपदाओं का बढ़ता खतरा
हाल के वर्षों में अत्यधिक वर्षा, सूखा, तूफान, भूस्खलन, हीटवेव और जंगल की आग जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं। इन आपदाओं से वन्यजीवों, कृषि और ग्रामीण समुदायों पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। विशेष रूप से छत्तीसगढ़ जैसे वन-प्रधान क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन से जंगलों की जैव विविधता, महुआ, चार, तेंदू फल, साल वृक्ष और अन्य महत्वपूर्ण वन उत्पादों पर प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिल रहा है।

अत्यधिक वर्षा और तापमान में उतार-चढ़ाव से जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ सकती हैं, जिससे कार्बन स्टॉक और पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ सकता है। इस प्रकार, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली को मजबूत करना आवश्यक हो जाता है ताकि संभावित आपदाओं का पूर्वानुमान लगाकर सही समय पर कार्रवाई की जा सके।

वानिकी और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली की भूमिका
- रिमोट सेंसिंग और भौगोलिक सूचना प्रणाली तकनीक
जलवायु पूर्वानुमान और वानिकी अनुसंधान में रिमोट सेंसिंग एवं भौगोलिक सूचना प्रणाली तकनीकों का उपयोग महत्वपूर्ण है। इनकी सहायता से वृक्षों की सेहत, आग लगने की संभावना, मिट्टी की नमी और जलवायु परिवर्तनों की निगरानी की जा सकती है।

- समुदाय-आधारित चेतावनी प्रणाली
ग्रामीण और वन-आश्रित समुदायों को जलवायु परिवर्तन और आपदाओं से बचाव के लिए शिक्षित और जागरूक करना जरूरी है। यदि स्थानीय वनवासियों को जलवायु संकेतकों की पहचान और आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली में शामिल किया जाए, तो यह वन संरक्षण के लिए फायदेमंद होगा।

- जलवायु-लचीले वृक्ष प्रजातियों का रोपण
छत्तीसगढ़ और अन्य अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में सूखा-प्रतिरोधी वृक्ष प्रजातियां, जैसे बबूल, अर्जुन, तेंदू, नीम, और सागौन, लगाने से जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम किया जा सकता है।

- बहु-स्तरीय वन प्रबंधन
वन पारिस्थितिकीय तंत्र में आधुनिक तकनीकों के साथ पारंपरिक ज्ञान का समावेश करके दीर्घकालिक समाधान विकसित किए जा सकते हैं।

” सामूहिक रूप से प्रारंभिक चेतावनी अंतर को पाटना” केवल एक थीम नहीं, बल्कि एक आवश्यक रणनीति है, जो समाज, वैज्ञानिकों, सरकारों और स्थानीय समुदायों के संयुक्त प्रयासों की मांग करती है। वन और जलवायु तंत्र एक-दूसरे पर निर्भर हैं, इसलिए जलवायु पूर्वानुमान को सटीक बनाना, वन प्रबंधन को मजबूत करना और समुदायों को शिक्षित करना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।
जलवायु अनुकूल वन प्रबंधन की आवश्यकता
यदि हम जलवायु अनुकूल वन प्रबंधन को प्राथमिकता दें और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली को विकसित करें, तो न केवल वनों की जैव विविधता को संरक्षित किया जा सकता है, बल्कि पर्यावरणीय आपदाओं के प्रभावों को भी कम किया जा सकता है।
जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में सामूहिक भागीदारी और सतत वन प्रबंधन ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है।
अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर