Blog

सन 1990 में टीआई पर 1 हजार रुपए रिश्वत मांगने का लगा आरोप, ट्रायल कोर्ट ने सन 99 में दी तीन साल की सजा, टीआई की मौत के बाद भी केस लड़ती रही पत्नी,अब दोष मुक्ति का आदेश

– सन 1990 में 1 हजार रुपए की रिश्वत लेने के मामले में टीआई के खिलाफ प्रकरण दर्ज किया गया था। जिस पर ट्रायल कोर्ट ने 1999 में टीआई को 3 वर्ष कठोर कारावास की सजा दी थी। हाई कोर्ट में अपील लंबित रहने के दौरान ही टीआई की मौत हो गई थी। उनकी पत्नी उसके बाद भी केस लड़ती रही। सुनवाई में यह तथ्य आया कि जो मुचलका दो दिनों पहले ही दे दिया गया था उसी मुचलके को देने के लिए दो दिनों बाद रकम मांगने की शिकायत की गई है। इसके अलावा शिकायतकर्ता मारपीट के मामले में काउंटर एफआईआर दर्ज करवाना चाहता था। अपनी रिपोर्ट दर्ज नहीं होने पर उसने टीआई के खिलाफ झूठी शिकायत की थी। टीआई को दोषमुक्त कर दिया गया है।

बिलासपुर। वर्ष 1990 में टीआई पर एक हजार रुपए रिश्वत लेनी का आरोप लगा। जिस पर ट्रायल कोर्ट ने 9 साल बाद सन 1999 में टीआई को तीन साल की सजा सुनाई। जिसके खिलाफ टीआई ने हाईकोर्ट में अपील की। सुनवाई के दौरान टीआई की मौत हो गई। पर पति को न्याय दिलाने के लिए उनकी पत्नी केस लड़ती रही। तत्वों के आधार पर हाईकोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता के खिलाफ 8 अप्रैल 1990 को मारपीट के मामले में गिरफ्तार कर जमानत मुचलके पर रिहा कर दिया गया था। पर इसके दो दिनों बाद जमानत देने के नाम पर रिश्वत मांगने का आरोप टीआई पर लगाया गया था। रकम नहीं देने पर जमानत नहीं देने की धमकी देने की शिकायत की गई थी। जिस पर हाईकोर्ट में संजय के अग्रवाल की सिंगल बेंच ने कहा कि जो जमानत दो दिनों पहले ही दे दी गई थी उसके एवज में रुपयों की मांग की शिकायत और औचित्यहीन लगती है। इसके अलावा यह भी बात सामने आई कि शिकायतकर्ता काउंटर एफआईआर करवाना चाहता था। दर्ज नहीं करने पर उसने क्षुब्ध होकर झूठी एफआईआर की थी। 26 सालों तक चले केस के बाद टीआई को अदालत ने दोषमुक्त कर दिया है।

रायपुर के बसना थाना में 8 अप्रैल 1990 की एक एफआईआर की गई थी। जिसमें थाना बसना क्षेत्र के ग्राम थुरीकोना निवासी जैतराम साहू ने सहनीराम, नकुल और भीमलाल साहू के खिलाफ मारपीट की शिकायत दर्ज कराई थी। थाना प्रभारी गणेशराम शेंडे ने तत्काल अपराध दर्ज किया। चूंकि मामला आईपीसी की धारा 324 के तहत जमानती था, इस वजह से तीनों आरोपियों को उसी दिन मुचलके पर रिहा कर दिया गया। लेकिन, इसके दो दिन बाद 10 अप्रैल 1990 को,एक आरोपी भीमलाल साहू ने एसपी, लोकायुक्त, रायपुर को शिकायत दी कि उसे रिहा करने के बदले एक हजार रुपए की रिश्वत मांगी गई थी। इस शिकायत के आधार पर लोकायुक्त पुलिस ने कार्रवाई की, जिसमें शेंडे को रंगे हाथों पकड़ने का दावा किया गया।

ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी सजा:–
इस कार्रवाई को आधार मानते हुए वर्ष 1999 में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 और 13(1)(D) के साथ धारा 13(2) के तहत दोषी ठहराते हुए विशेष न्यायालय ने शेंडे को तीन वर्ष की कठोर सजा और दो हजार रुपए जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ शेंडे ने हाई कोर्ट में अपील की थी। अपील लंबित रहते ही उनकी मौत हो गई। इसके बाद उनकी पत्नी ने मुकदमा लड़ा।

हाईकोर्ट ने कहा- रिश्वत का औचित्य नहीं बनता:–
हाईकोर्ट ने दस्तावेजों और गवाहों के बयानों के आधार पर पाया कि जिस रिश्वत की मांग की बात की गई, उसका कोई औचित्य नहीं बनता, क्योंकि शिकायतकर्ता और उसके परिजन को पहले ही 8 अप्रैल को शाम 5 बजे जमानत पर रिहा कर दिया गया था। फिर दो दिन बाद 10 अप्रैल को उसी जमानत की एवज में पैसे की मांग करने का आरोप तथ्यों के मुताबिक असंभव लगता है।

थाना प्रभारी से नाराज होने पर की थी शिकायत:–
हाई कोर्ट ने यह भी माना कि शिकायत करने वाला भीमलाल साहू उसकी शिकायत पर कार्रवाई नहीं होने के कारण थाना प्रभारी शेंडे से नाराज था। हाई कोर्ट ने ऐसे में ट्रैप की परिस्थितियां संदेहास्पद मानी। कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष रिश्वत की मांग साबित करने में असफल रहा और ट्रैप में जब्त राशि का कोई वैधानिक आधार नहीं था।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *