सरकार से खुली धोखाधड़ी, अपराधियों को खुला संरक्षण?कलेक्टर की चुप्पी या साजिश—पूरा सिस्टम सवालों के घेरे में—सीधे शासन को चुनौती⸻सरकारी रिकॉर्ड में संगठित कूट रचना—क्या अंदरूनी मिलीभगत?

बिलासपुर/GPM/पेंड्रा। सरकारी दस्तावेजों में कथित कूट रचना का मामला अब एक सामान्य प्रशासनिक गड़बड़ी नहीं, बल्कि सीधे-सीधे शासन से धोखाधड़ी का रूप ले चुका है। अधिकार अभिलेख में जिस तरह से फर्जी प्रविष्टि जोड़कर जमीन की प्रकृति बदली गई, उसने पूरे प्रशासनिक ढांचे की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा कर दिया है। यह घटनाक्रम इस बात की ओर इशारा करता है कि मामला सतही नहीं, बल्कि गहराई तक जुड़ा हुआ है।
सिस्टम के भीतर से हुआ खेल?
सरकारी रिकॉर्ड में बदलाव किसी बाहरी व्यक्ति के लिए आसान नहीं होता। यह प्रक्रिया केवल उन्हीं लोगों के माध्यम से संभव है जिनकी पहुंच और भूमिका सिस्टम के भीतर होती है। ऐसे में यह सवाल और भी तीखा हो जाता है कि आखिर यह कूट रचना किसके द्वारा और किसकी जानकारी में की गई? जब तक इसका स्पष्ट उत्तर सामने नहीं आता, तब तक पूरा मामला संदेह के घेरे में ही रहेगा।
तहसीलदार अविनाश कुजूर के फैसले—सवालों के घेरे में
मामले में तहसीलदार अविनाश कुजूर के फैसलों ने विवाद को और गहरा कर दिया है। पहले नामांतरण को निरस्त किया जाना और बाद में उसी मामले में दोबारा मंजूरी देना प्रशासनिक प्रक्रिया में गंभीर विरोधाभास को दर्शाता है। यह स्थिति यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या फैसले नियमों के आधार पर लिए गए या फिर किसी अन्य प्रभाव में।
कलेक्टर लीना कमलेश मंडावी की कार्यशैली—चुप्पी क्यों?
जिले की सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी होने के बावजूद कलेक्टर लीना कमलेश मंडावी की ओर से इस मामले में अपेक्षित सख्ती नजर नहीं आ रही है। इतने गंभीर आरोपों के बावजूद न तो किसी जिम्मेदार अधिकारी की स्पष्ट पहचान की गई है और न ही कोई कठोर कार्रवाई सामने आई है। यह चुप्पी अब सामान्य नहीं मानी जा रही, बल्कि प्रशासनिक निष्क्रियता और संभावित संरक्षण की ओर इशारा करती है।
राज्यमंत्री का दावा जिले में ही तोड़ रहा दम—-
गौरतलब है कि कुछ दिन पूर्व तोखन साहू, जो भारत सरकार के आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय में केंद्रीय राज्य मंत्री हैं और बिलासपुर से लोकसभा सांसद हैं, ने गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के दौरे के दौरान कहा था—
“भ्रष्टाचार से मुक्त अगर कोई सरकार है, तो वह भाजपा की सरकार है।”
लेकिन जमीनी हकीकत इस दावे के उलट तस्वीर पेश करती नजर आ रही है। जिले में हालात ऐसे दिखाई दे रहे हैं कि भ्रष्टाचार इस कदर व्याप्त है कि सरकार से धोखाधड़ी करने वाले लोगों को ही सरक्षण मिलने के आरोप सामने आ रहे हैं। सबसे गंभीर आरोप यह है कि जिला कलेक्टर के स्तर पर ही कार्रवाई का अभाव, ऐसे लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से बचाने का संकेत देता है।
शासन से धोखाधड़ी—फिर भी कार्रवाई का अभाव
सरकारी दस्तावेजों में छेड़छाड़ और कूट रचना स्पष्ट रूप से गंभीर अपराध है। यह मामला भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत दंडनीय है, जहां ऐसे कृत्यों पर सख्त कार्रवाई का प्रावधान है। इसके बावजूद अब तक कोई निर्णायक कदम सामने नहीं आना प्रशासनिक इच्छाशक्ति पर सवाल खड़ा करता है।
क्या अपराधियों मिल रहा संरक्षण?
पूरे घटनाक्रम को देखते हुए यह आशंका अब खुलकर सामने आ रही है कि सरकार से धोखाधड़ी करने वाले लोगों को ही संरक्षण मिल रहा है। जांच की धीमी गति, कार्रवाई का अभाव और जिम्मेदारों की पहचान न होना इस संदेह को और मजबूत करता है। यह स्थिति केवल एक मामले तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न है।
जनता का भरोसा क्यों टूट रहा?
जब सरकारी दस्तावेजों में ही इस तरह की छेड़छाड़ संभव हो और उस पर भी कार्रवाई न हो, तो आम नागरिक के मन में अविश्वास पैदा होना स्वाभाविक है। यह मामला अब प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही की परीक्षा बन चुका है।
सबसे बड़ा सवाल अब भी कायम
सरकारी रिकॉर्ड बदला गया, शासन से धोखाधड़ी हुई, और फैसलों में विरोधाभास सामने आया—फिर भी कार्रवाई का अभाव कई गंभीर सवाल खड़े करता है। आखिर दस्तावेज किसने बदला, किस अधिकारी ने इसे वैधता दी, और सबसे बड़ा सवाल—क्या कलेक्टर की चुप्पी किसी को बचाने की कोशिश है?
यह सवाल अब सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के सामने खड़ी चुनौती है।
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