Blog

स्थायी कृषि के लिए वानिकी का योगदान एवं पेंड्रा-गौरेला-मरवाही में इसकी संभावनाएं

अवसर: विकसित कृषि संकल्प अभियान

बिलासपुर – कृषि और वानिकी, दोनों ही भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। बदलते पर्यावरण, गिरते भूजल स्तर, और बढ़ती लागत के बीच कृषि अब अकेले आगे नहीं बढ़ सकती। वानिकी — विशेषकर कृषि वानिकी — इस संकट का समाधान बनकर उभर रही है।

पेंड्रा-गौरेला-मरवाही जैसे वन-प्रधान जिले में, जहाँ आदिवासी संस्कृति और प्रकृति का गहरा संबंध है, वानिकी केवल एक संसाधन नहीं बल्कि आजीविका और संस्कृति का आधार भी है। विकसित कृषि संकल्प अभियान इस क्षेत्र में वानिकी के वैज्ञानिक, व्यावसायिक और सामाजिक पक्ष को पुनः स्थापित करने का अवसर बन सकता है।

वर्तमान कृषि परिदृश्य और समस्याएं

इस क्षेत्र में किसान निम्नलिखित समस्याओं से जूझ रहे हैं:

  • वर्षा की अनियमितता और बढ़ता तापमान
  • भूमिगत जल स्तर में गिरावट
  • मिट्टी की उर्वरता में गिरावट
  • सीमित फसल विविधता और आय के सीमित स्रोत
  • जलवायु परिवर्तन की तीव्रता से बढ़ता जोखिम

इन चुनौतियों के समाधान के लिए खेती में वृक्षों का समावेश आवश्यक है।

वानिकी का कृषि में योगदान

  • मिट्टी संरक्षण: वृक्षों की जड़ें कटाव रोकती हैं और भूमि की उर्वरता बढ़ाती हैं।
  • जल संचयन: वृक्ष भूमि की जलधारण क्षमता बढ़ाते हैं और जल स्रोतों को पुनर्जीवित करते हैं।
  • जलवायु अनुकूलन: वृक्ष गर्म हवाओं से फसल को सुरक्षा प्रदान करते हैं और सूक्ष्म जलवायु बनाते हैं।
  • आय का अतिरिक्त स्रोत: लकड़ी, फल, गोंद, चारा, और लघु वनोपज से आमदनी बढ़ती है।
  • कार्बन सिंक: वृक्ष जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने में सहायक होते हैं।
  • जैव विविधता संवर्धन: पक्षियों, मधुमक्खियों और लाभकारी कीटों को आवास मिलता है।

पेंड्रा-गौरेला-मरवाही: एक जैव-वन क्षेत्र

  • इस क्षेत्र में 1200–1400 मिमी औसत वर्षा होती है, लेकिन जल संचयन की संरचनाएँ अपर्याप्त हैं।
  • महुआ, चिरौंजी, हर्रा, बहेरा, अर्जुन, साजा, बाँस आदि की समृद्धता इस क्षेत्र की प्रमुख विशेषता है।
  • वनोपज आधारित आजीविका — जैसे महुआ फूल संग्रह, चिरौंजी बीज, आजीविका का पारंपरिक आधार रही है।
  • पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक के समन्वय से ग्रामीणों को आर्थिक रूप से सशक्त किया जा सकता है।

कृषि वानिकी: एक आधुनिक समाधान

कृषि वानिकी वह प्रणाली है जिसमें एक ही भूमि पर वृक्ष, फसल, और कभी-कभी पशुपालन एक साथ किया जाता है।

प्रमुख कृषि वानिकी मॉडल:

  • कृषि- वन पद्धति
    फसलें: धान, कोदो, तिल, दलहन
    वृक्ष: नीम, सहजन, महुआ
  • कृषि-उद्यानिकी पद्धति
    फसलें: सब्जियाँ, दलहन
    वृक्ष: आम, अमरूद, चिरौंजी
  • कृषि-चारागाह पद्धति
    उपयोग: पशुपालन
    वृक्ष: खैर, बबूल, सेमल
  • बाउंड्री वृक्षारोपण
    खेत की मेड़ों पर वृक्ष: बाँस, करंज, अर्जुन, नीम

लाभ:

  • एक ही खेत से 3–4 स्रोतों से आय
  • सूखा और गर्मी के समय सुरक्षा
  • वन उत्पादों का घरेलू उपयोग और बाजार में बिक्री
  • जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में सहायक

स्थानीय उपयुक्त वृक्ष प्रजातियाँ

  • चिरौंजी: बीज और तेल के लिए उपयुक्त; आदिवासी समुदाय की आमदनी का स्रोत
  • महुआ: फूल, फल, और औषधीय उपयोग; धार्मिक व सांस्कृतिक महत्व
  • बाँस: निर्माण, कृषि उपकरण, हस्तशिल्प में उपयोग; तेजी से बढ़ने वाला
  • नीम, सहजन: जैविक कीटनाशक, औषधीय उपयोग
  • अर्जुन: हृदय रोग की औषधि; नदी किनारे उपयुक्त

सरकारी योजनाएं और सहायता

  • किसान वृक्ष मित्र योजना (2023–24):
  • किसानों को नि:शुल्क पौधे (10–50 तक)
  • तकनीकी मार्गदर्शन और प्रशिक्षण
  • 3 वर्ष तक देखरेख और निगरानी
  • आय आधारित मॉडल — भविष्य में लाभांश का हिस्सा

अन्य योजनाएं:

  • राष्ट्रीय कृषि वानिकी मिशन
  • लघु वनोपज योजना: संग्रह, भंडारण, मूल्य संवर्धन और विपणन
  • किसान उत्पादक संगठन : लघु वनोपज आधारित किसान उत्पादक संगठन

सुझाव और रणनीति

  • प्रत्येक किसान अपनी भूमि की मेड़ पर कम से कम 10 बहुउपयोगी वृक्ष लगाए।
  • स्थानीय प्रजातियों को प्राथमिकता दें — जैसे नीम, सहजन, महुआ, बाँस, अर्जुन।
  • महिलाओं और युवाओं को लघु वनोपज के संग्रह, प्रसंस्करण और विपणन से जोड़ा जाए।
  • समूह आधारित पौधरोपण को प्रोत्साहन दें — यह पर्यावरण संरक्षण के साथ सामाजिक एकता को भी बढ़ावा देता है।

“जहाँ पेड़ हैं, वहाँ पानी है; जहाँ पानी है, वहाँ जीवन है।”
“कृषि और वानिकी – दोनों मिलकर किसान को समृद्ध बनाते हैं।”

अब समय आ गया है कि हम वानिकी को केवल जंगल की बात न समझें, बल्कि इसे अपने खेतों की समृद्धि, गाँव की आत्मनिर्भरता और पर्यावरण की सुरक्षा का माध्यम बनाएं। पेंड्रा-गौरेला-मरवाही जैसे वन बहुल क्षेत्रों में कृषि वानिकी से कृषि की आय, सुरक्षा और स्थिरता — तीनों में वृद्धि हो सकती है।

“वन और किसान एक-दूसरे के पूरक हैं – समृद्ध जंगल = समृद्ध किसान = समृद्ध भारत”

अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *