आठवीं कक्षा की छात्रा से सामूहिक दुष्कर्म के आरोपियों की 20-20 साल कैद की सजा बरकरार
आठवीं कक्षा की छात्रा से वर्ष 2017 में दो आरोपियों ने दुष्कर्म किया। ट्रायल कोर्ट में दोनों आरोपियों को 20–20 साल सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ आरोपियों ने हाईकोर्ट में अपील की थी। हाई कोर्ट के डिवीजन बेंच ने सजा को बरकरार रखते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष साबित करने में सफल रहा है कि घटना के समय पीड़िता की आयु 18 वर्ष से कम थी। किसी महिला का एक या एक से अधिक व्यक्तियों द्वारा समूह बनाकर या एक सामान्य राजनीति से बलात्कार किया जाता है तो उनमें से प्रत्येक व्यक्ति को बलात्कार का प्राप्त करने वाला माना जाएगा इसके साथ ही दोनों आरोपियों को अपराध के लिए समान रूप से दोषी ठहराते हुए निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा गया है।
बिलासपुर। बिलासपुर हाईकोर्ट ने 8वीं कक्षा की छात्रा से सामूहिक दुष्कर्म के दो दोषियों की सजा के खिलाफ दायर अपील को खारिज कर निचली अदालत द्वारा दी गई सजा को बरकरार रखा है। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस बीडी गुरु ने कहा कि निचली अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर दोषसिद्धि का जो आदेश दिया है, वह पूरी तरह से न्यायोचित और सही है। विशेष न्यायाधीश (एफटीसी) ने दोनों आरोपित विपिन कुमार जांगड़े और सुनील कुर्रे को धारा 376-डी (सामूहिक दुष्कर्म) के तहत 20-20 साल सश्रम कारावास और 12-12 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। साथ ही धारा 323/34 और 506(बी) में अतिरिक्त कारावास और अर्थदंड भी लगाया था। इसी सजा को चुनौती देते हुए दोनों आरोपितों ने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी।
पीड़िता की गवाही में आघात और विसंगतियों को समझना न्यायालय का दायित्व है-
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यौन अपराधों के मामलों में पीड़िता की गवाही का मूल्यांकन करते समय न्यायालय को अत्यंत संवेदनशील और सूक्ष्म दृष्टिकोण अपनाना होता है। घटना के दौरान हुए मानसिक आघात और परिस्थितियों के कारण बयान में संभावित विसंगतियां स्वाभाविक होती हैं। न्यायालय घटनाओं के सटीक विवरण पर नहीं, बल्कि गवाही में निहित सच्चाई और विश्वसनीयता पर ध्यान देता है।
यह है मामला-
घटना 18 नवम्बर 2017 की है, जब पीड़िता अपने घर के आंगन में बने शौचालय में गई थी। उसी दौरान आरोपित विपिन और सुनील ने उसे पकड़कर मुंह पर रूमाल बांध दिया और पैरों को कपड़े से बांधकर पिटाई की। दोनों आरोपितों ने चाकू दिखाकर धमकाया और बारी-बारी से पीड़िता के साथ दुष्कर्म किया। पीड़िता के शोर मचाने पर भाई-बहन और पड़ोसी पहुंचे, तब आरोपित भाग गए। पीड़िता ने पुलिस चौकी जाकर रिपोर्ट दर्ज कराई, जिस पर बिलासपुर के मस्तूरी थाने में एफआइआर दर्ज कर जांच शुरू हुई।
गवाही, एफएसएल रिपोर्ट और मेडिकल साक्ष्य से अभियोजन पक्ष का केस सिद्ध-
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि पीड़िता ने दोनों आरोपितों की भूमिका स्पष्ट रूप से बयान में बताई है। पीड़िता के भाई, बहन, माता-पिता और पड़ोसी गवाहों के बयानों में भी घटना की पुष्टि होती है। इसके अतिरिक्त, एफएसएल रिपोर्ट में पीड़िता के कपड़ों पर वीर्य और मानव शुक्राणु पाए जाने की पुष्टि हुई है। मेडिकल रिपोर्ट में भी पीड़िता के साथ बलपूर्वक यौन शोषण और शारीरिक चोटों का उल्लेख है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला देते हुए दोषसिद्धि सही ठहराई-
कोर्ट ने कहा कि रिकार्ड में उपलब्ध सामग्री और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित कानून के आधार पर निचली अदालत का निर्णय पूरी तरह उचित है। सामूहिक दुष्कर्म की धारा 376-डी की परिभाषा के अनुरूप यह मामला पूरी तरह फिट बैठता है, जिसमें प्रत्येक आरोपी की सक्रिय संलिप्तता स्पष्ट रूप से सिद्ध है।