कछुए के शिकार के मामले में महामाया मंदिर ट्रस्ट के उपाध्यक्ष को मिली अग्रिम जमानत, डीएफओ पर भी अदालत ने की टिप्पणी
सिद्ध शक्तिपीठ महामाया मंदिर परिसर में स्थित कुंड में मृत मिले कछुओं के मामले में वन विभाग में मंदिर ट्रस्ट के उपाध्यक्ष सतीश शर्मा और सफाई करने वाले ठेकेदार समेत अन्य के खिलाफ वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 9 के तहत शिकार का अपराध दर्ज किया था। इसमें दो आरोपियों की पूर्व में गिरफ्तारी हो चुकी है। वही सतीश शर्मा ने अग्रिम जमानत याचिका लगाई थी। याचिका की सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की सिंगल बेंच में हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने तर्कों को सुनने के बाद माना कि वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट की धारा 9 सतीश शर्मा पर लागू नहीं होती। इसके साथ ही डीएफओ के खिलाफ भी टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा कि डीएफओ एक आईएफएस होता है,उसके पास क्या डिग्री है, न तो उसे वन्य जीव संरक्षण अधिनियम की धारा 9 पता है और न ही 39 और 49,किस तरह से उसने एफआईआर करवाई है। इसके साथ ही मंदिर के उपाध्यक्ष की अग्रिम जमानत याचिका मंजूर कर ली गई।
Bilaspur बिलासपुर। महामाया मंदिर ट्रस्ट के उपाध्यक्ष सतीश शर्मा को कछुए से शिकार के मामले में अग्रिम जमानत मिल गई है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की सिंगल बेंच ने सतीश शर्मा को अग्रिम जमानत देते हुए वन विभाग के डीएफओ पर वन्य जीव अधिनियम के सही जानकारी नहीं होने पर फटकार भी लगाई है।
महामाया मंदिर ट्रस्ट परिसर की तालाब में से मृत कछुए मिले थे। इसमें वन्य जीव संरक्षण अधिनियम की धारा 9 के तहत वन विभाग ने मंदिर के उपाध्यक्ष सतीश शर्मा को आरोपी बनाया था। मामले में दो लोगों की गिरफ्तारी वन विभाग के द्वारा पूर्व में की गई थी और सतीश शर्मा की तलाश वन विभाग की टीम को थी। सतीश शर्मा ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से अग्रिम जमानत याचिका हाईकोर्ट में लगाई थी। पिछले सुनवाई के बाद वन विभाग से डायरी की मांग करते हुए आज सोमवार को सुनवाई की तिथि रखी गई थी। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की सिंगल बेंच में आज मामले की लंबी सुनवाई हुई।
सतीश शर्मा के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 9 के तहत सतीश शर्मा पर अपराध दर्ज किया गया है। यह एक्ट शिकार के लिए होता है,पर सतीश शर्मा पर शिकार का आरोप ही नहीं है। उन पर आरोप है कि उन्होंने सफाई के लिए ताला खुलवाने हेतु परमिशन दी,जिसके बाद सफाई के दौरान कछुए मृत पाए गए। चीफ जस्टिस ने पूछा कि कितने बजे सफाई के लिए अनुमति दी गई। जब याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने बताया कि रात 12 बजे सफाई के लिए अनुमति दी गई तो फिर से चीफ जस्टिस ने पूछा कि रात को कौन सी सफाई होती है,जो इतनी रात को ताला खोला गया। इस तरह से तो आप मंदिर की तिजोरी लुटवा देंगे। जिस पर सतीश शर्मा के अधिवक्ता ने बताया कि दिन में नवरात्रि के चलते भक्तों की भीड़ रहती है इसलिए रात को ही सफाई करवाई जाती है।
सतीश शर्मा ने अधिवक्ता ने बताया कि वन विभाग ने भले ही शिकार का मामला दर्ज कर दिया है पर यह शिकार का मामला है ही नहीं। इस मामले में ना तो शिकार की बात सामने आई है ना ही ट्रैफिकिंग की बात सामने आई है। कछुए कही से लाने या ले जाने के दौरान पकड़े नहीं गए हैं। सफाई के दो दिन बाद बदबू आने पर मृत कछुओं को रिकवर किया गया है। इसमें सफाई कर्मियों से भी किसी तरह के साठगांठ की भी कोई बात मंदिर उपाध्यक्ष के खिलाफ नहीं है। चीफ जस्टिस ने पूछा कि वहां मछली पकड़ने की अनुमति थी क्या? जवाब नहीं मिलने पर पूछा कि तो फिर वहां जाल कैसे मिला। जिस पर अधिवक्ता के द्वारा बताया गया कि वो सफाई के लिए था न कि मछली पकड़ने के लिए। लोग मंदिर परिसर के कुंड में फूल पत्ती डालते हैं,पूजा का सामान विसर्जित करते हैं, कई श्रद्धालु घर से पूजा का सामान लाकर विसर्जित करते हैं। इसमें कई रासायनिक तत्व भी होते है। कुंड में सेvफूल पत्तियों और रासायनिक सामग्रियों को बाहर निकालने के लिए जाल की जरूरत पड़ती है।
याचिकाकर्ता मंदिर के उपाध्यक्ष सतीश शर्मा के अधिवक्ता ने कहा कि मंदिर की सफाई एक अकेले उपाध्यक्ष का निर्णय नहीं था बल्कि ट्रस्ट की बैठक में सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया था। ट्रस्ट के बैठक के निर्णय की प्रति भी अदालत को अधिवक्ता ने दिखाई।
सतीश शर्मा के अधिवक्ता ने बताया कि वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की धारा 9 के तहत हमारे खिलाफ अपराध दर्ज किया गया है पर हमारा अपराध क्या है ये ही नहीं बता पा रहे है। अदालत द्वारा पूछने पर वन्य जीव संरक्षण अधिनियम की धारा 51 में क्या है तो अधिवक्ता ने बताया कि वन्य जीव संरक्षण अधिनियम की धारा 9 जहां शिकार को प्रतिबंधित करती हैं,वही वन्य जीव संरक्षण अधिनियम की धारा 51 सजा का प्रावधान करती हैं। अदालत द्वारा कितनी सजा का प्रावधान है पूछने पर बताया गया कि यदि जंगल में और वन्य जीव अभ्यारण्य में किया जाता है तो सात साल की सजा का प्रावधान है और यदि बाहर शिकार किया जाए तो सात साल से कम ( तीन साल) सजा का प्रावधान है जो कि बेलेबल हैं। इस हिसाब से याचिकाकर्ता जमानत पाने का अधिकार है। सतीश शर्मा के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि हंटिंग से वायलेशन हुआ यह आरोप है पर यह आरोप हम पर लागू नहीं होता।
तब चीफ जस्टिस ने वन विभाग के अधिवक्ता से पूछा कि डीएफओ जो है वह कहा तक पढ़ा लिखा है,क्या डिग्री है उसके पास किस तरह एफआईआर करवानी है यह भी उसको नहीं पता,जिसे वन्य जीव संरक्षण अधिनियम की धारा 9 के तहत आरोपी बनाया गया है उस पर यह एक्ट ( अपीलार्थी सतीश शर्मा) पर लागू ही नहीं होती। डीएफओ को न तो वन्य जीव संरक्षण अधिनियम की धारा 39 पता है और न 49। किसके ऊपर एफआईआर और क्यों करवाई हैं यह भी उसको नहीं पता। एफआईआर भी उसने अज्ञात के नाम से करवा रखी है।
अदालत को बताया गया कि पहले अज्ञात के ऊपर एफआईआर करवाने के बाद विवेचना की गई है। अदालत ने पूछा कि विवेचना में क्या प्राप्त हुआ तो जवाब दिया गया कि मंदिर की ड्यूटी में तैनात मगर सैनिक का बयान लिया गया है,उसने अपने बयान में बताया है कि 21 मार्च को मंदिर के उपाध्यक्ष सतीश शर्मा ने बुलवा कर कहा कि कल ठेकेदार सफाई के लिए आएगा उसे पीछे वीआईपी गेट खोल के तालाब की सफाई करवानी है। इस बात की चर्चा किसी से नहीं करनी है। 22 मार्च की रात 8:45 बजे सतीश शर्मा ने मुझे फोन कर कहा कि रात को जायसवाल ठेकेदार अपने आदमियों को लेकर आ रहा है उससे सफाई करवाना। रात को करीबन 10 बजे ठेकेदार जायसवाल अकेला आया। जब मैने उससे संपर्क किया तो उसने कहा कि मेरे मजदूर आ रहे हैं थोड़ी देर में फिर सफाई शुरू होगी। टाइम लगने पर मैं आराम करने चले गया। जब ठेकेदार के आदमी आए तो मैंने अपने अधीनस्थ को भेज कर ताला खोलने के लिए कह दिया। इसके बाद मेरे अधीनस्थ ने सफाई के लिए ताला खोल दिया। बयान सुनकर चीफ जस्टिस ने कहा कि इसमें तो केवल सफाई का निर्देश था,बयान से शिकार के बात की कहां पुष्टि होती है। इसके साथ ही चीफ जस्टिस ने महामाया मंदिर ट्रस्ट के उपाध्यक्ष सतीश शर्मा की अग्रिम जमानत याचिका को मंजूर कर ली।