सिस्टर पुष्पिका की जल छड़ी: परंपरा, विश्वास और विज्ञान की एक यात्रा

बिलासपुर – गुजरात के दाहोद जिले के एक शांत से गाँव में, जब सिस्टर पुष्पिका बारिया अपने हाथ में एक नारियल लेकर खेतों के बीच चलती हैं, तो लोग ठहरकर उन्हें देखते हैं। उनकी आँखें ज़मीन पर केंद्रित होती हैं और हाथ में पकड़ा नारियल जैसे प्रकृति से संवाद कर रहा होता है। यह दृश्य केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि एक जीवित ज्ञान परंपरा है जो पीढ़ियों से चली आ रही है – भूमिगत जल स्रोत की पारंपरिक खोज, जिसे लोकभाषा में “जल छड़ी विधि” या डाउजिंग कहा जाता है।

सिस्टर पुष्पिका और नारियल की छड़ी
बचपन से ही हमने देखा है कि सिस्टर पुष्पिका ज़मीन पर नारियल या नीम की टहनी लेकर ऐसे चलती हैं जैसे उन्हें ज़मीन की गहराइयों से संवाद करना आता हो। उनके अनुभव और पारंपरिक ज्ञान ने गाँव के कई बोरवेल सही स्थान पर खोदवा दिए, जिससे आज भी खेतों को पानी मिल रहा है।

उनकी यह विधि किसी औपचारिक प्रशिक्षण पर नहीं, बल्कि लोक-ज्ञान, पर्यावरणीय संकेतों और अनुभव पर आधारित है। उनका विश्वास है कि ज़मीन के नीचे से आने वाली ऊर्जा या कंपन को नारियल महसूस करता है और झुककर संकेत देता है।

डाउजिंग: पारंपरिक जल खोज पद्धति
क्या है डाउजिंग?
डाउजिंग एक प्राचीन पद्धति है जिसमें Y-आकार की लकड़ी की छड़ी, नारियल या तांबे की रॉड का उपयोग करके भूमिगत जल स्रोत की पहचान की जाती है। इसे भारतीय गांवों में विशेष मान्यता प्राप्त है।

गुजरात में में डाउजिंग का महत्व:
- बुजुर्गों और विशेष रूप से महिलाओं जैसे सिस्टर पुष्पिका के पास यह कौशल होता है।
- आज भी कई किसान उनके सुझाव पर कुएँ या बोरवेल खुदवाते हैं।
- यह परंपरा पीढ़ियों से बिना किसी लिखित दस्तावेज़ के चली आ रही है।

क्या यह वैज्ञानिक है?
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से डाउजिंग को विश्वसनीय विधि नहीं माना गया है, क्योंकि:
अब तक कोई वैज्ञानिक अध्ययन यह सिद्ध नहीं कर पाया है कि नारियल या छड़ी सच में जल स्रोतों पर प्रतिक्रिया देती है।

इसे एक संयोग या मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया माना जाता है।
फिर भी, सिस्टर पुष्पिका जैसी लोगों की सफलताओं को नज़रअंदाज़ करना भी मुश्किल है – शायद उनका ज्ञान पर्यावरणीय संकेतों, वनस्पति, मिट्टी और अनुभव पर आधारित होता है, जो विज्ञान से इतर होते हुए भी व्यावहारिक हो सकता है।
आधुनिक जल खोज विधियाँ
वर्तमान समय में सरकारें और वैज्ञानिक संस्थाएँ जल स्रोत की खोज के लिए तकनीकी विधियों का उपयोग कर रही हैं:
(i) जियोफिजिकल सर्वे :
मिट्टी और चट्टानों की जल धारण क्षमता मापकर जल स्रोत की सटीक जानकारी
(ii) रिमोट सेंसिंग एवं GIS:
उपग्रह चित्रों और नक्शों की मदद से जल संरचना का विश्लेषण।
(iii) हाइड्रोजियोलॉजी:
जलविज्ञान एवं भूगर्भीय सर्वेक्षण के संयुक्त परिणामों से गहराई और जल स्तर का पता।
परंपरा और विज्ञान: एक सेतु की आवश्यकता
सिस्टर पुष्पिका की परंपरा और वैज्ञानिक विधियाँ एक-दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि पूरक बन सकती हैं। जहाँ आधुनिक तकनीक सटीक मापन दे सकती है, वहीं सिस्टर पुष्पिका जैसा लोकज्ञान पर्यावरणीय समझ को और गहरा कर सकता है।
संभावनाएँ:
- पारंपरिक ज्ञान का दस्तावेज़ीकरण हो।
- वैज्ञानिक पद्धतियों में लोक विशेषज्ञों की भागीदारी बढ़े।
- युवाओं को लोक परंपरा और विज्ञान दोनों का प्रशिक्षण मिले।
सिस्टर पुष्पिका की नारियल वाली छड़ी सिर्फ़ एक उपकरण नहीं, बल्कि विश्वास, अनुभव और प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक है। यह परंपरा हमें सिखाती है कि विज्ञान केवल प्रयोगशालाओं में नहीं, बल्कि खेतों और गाँवों की पगडंडियों पर भी पनपता है – बस उसे समझने और मान देने की जरूरत है।
इस लेख के माध्यम से हम न केवल सिस्टर पुष्पिका बारिया के योगदान को सम्मान देते हैं, बल्कि यह भी स्वीकार करते हैं कि सतत विकास के लिए परंपरा और विज्ञान का समन्वय आवश्यक है।