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युवा बनाम पुराने जंगल: छत्तीसगढ़ के परिप्रेक्ष्य में बदलता कार्बन संतुलन

बिलासपुर – छत्तीसगढ़ को “भारत का हरित हृदय” कहा जाता है क्योंकि राज्य का लगभग 44% क्षेत्र (55,600 वर्ग किलोमीटर से अधिक) वनाच्छादित है। यहाँ के साल, सागौन, बांस, तेंदू, हर्रा-बहेड़ा और अन्य प्रजातियाँ न केवल स्थानीय समुदायों की आजीविका का आधार हैं, बल्कि कार्बन संतुलन और जलवायु स्थिरता के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
हाल के वैश्विक अध्ययनों की तरह छत्तीसगढ़ में भी वन संरचना में परिवर्तन दिखाई दे रहा है—पुराने जंगलों की तुलना में युवा वनों का विस्तार बढ़ रहा है। यह बदलाव राज्य के पारिस्थितिकीय और सामाजिक-आर्थिक संतुलन के लिए महत्वपूर्ण है।

छत्तीसगढ़ के जंगलों की स्थिति

  1. भौगोलिक वितरण – बस्तर, सरगुजा और कोरबा जिले में घने पुराने जंगल पाए जाते हैं, जबकि रायपुर, धमतरी और बिलासपुर में अपेक्षाकृत अधिकतर द्वितीयक (युवा) वन मिलते हैं।
  2. वनों की आयु संरचना – लगातार कटाई, खनन, वन आग और अवैध दोहन के कारण कई पुराने साल और सागौन वन खंडित हो रहे हैं। उनकी जगह पर द्वितीयक वृद्धि वाले युवा वन उग रहे हैं।
  3. बाँस के जंगल – राज्य में लगभग 18,000 वर्ग किमी क्षेत्र बाँस से आच्छादित है, जिसमें प्राकृतिक रूप से पुनर्जीवित युवा बाँस के झुरमुट अधिक मिलते हैं।

युवा वनों की विशेषताएँ छत्तीसगढ़ में

तेज़ी से वृद्धि: बांस और साल के युवा पौधे कार्बन डाइऑक्साइड को तेजी से अवशोषित करते हैं।

कम भंडारण क्षमता: पुराने सागौन और साल के विशाल पेड़ों में दशकों से जमा कार्बन संग्रहित होता है, जबकि युवा पेड़ इतनी दीर्घकालिक स्थिरता नहीं दे पाते।

जैव विविधता में अंतर: पुराने वनों में भालू, बाघ, जंगली भैंसा और अनेक औषधीय पौधे सुरक्षित रहते हैं, पर युवा वनों में यह विविधता कम पाई जाती है।

पुराने वनों की भूमिका

छत्तीसगढ़ के पुराने साल वन (खासकर बस्तर क्षेत्र में) नमी संरक्षण और वर्षा चक्र बनाए रखने में मदद करते हैं।

कार्बन बैंक: एक परिपक्व साल का पेड़ लगभग 200–300 टन कार्बन अपने जीवनकाल में संचित कर सकता है।

सामाजिक महत्व: तेंदू, महुआ और चिरौंजी जैसे लघु वनोपज (NTFP) ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सहारा हैं। ये प्रजातियाँ प्रायः पुराने वनों से ही मिलती हैं।

सांस्कृतिक महत्व: आदिवासी समाज में इन वनों का धार्मिक और सांस्कृतिक जुड़ाव है।

बदलता कार्बन संतुलन

वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि पुराने वनों का क्षरण होता रहा और उनकी जगह केवल युवा वन बढ़े, तो छत्तीसगढ़ में भी नेट कार्बन हानि दर्ज होगी।

उदाहरण के लिए, कोरबा और सरगुजा के कोयला खनन क्षेत्रों में पुराने वनों की कटाई से कार्बन उत्सर्जन बढ़ रहा है।

पुनर्वनीकरण (Reforestation) और वृक्षारोपण से भले ही नए पेड़ लग रहे हों, लेकिन वे दशकों तक पुराने वनों जैसा कार्बन भंडार तैयार नहीं कर पाएंगे।

नीतिगत सुझाव

  1. पुराने वनों का संरक्षण: बस्तर और सरगुजा जैसे जिलों के पुराने साल-सागौन वनों को “कार्बन हॉटस्पॉट” मानकर संरक्षित करना।
  2. खनन क्षेत्रों का पुनर्वनीकरण: खनन प्रभावित क्षेत्रों में मिश्रित प्रजाति आधारित वृक्षारोपण करना, ताकि दीर्घकालिक कार्बन भंडारण संभव हो।
  3. बाँस आधारित प्रबंधन: बाँस के युवा जंगलों का सतत उपयोग कर ग्रामीणों की आजीविका और कार्बन क्रेडिट, दोनों बढ़ाए जा सकते हैं।
  4. समुदाय आधारित संरक्षण: वन संरक्षण समितियों और ग्राम पंचायतों को पुराने वनों की सुरक्षा में अधिक अधिकार देना।
  5. वन आग नियंत्रण: ग्रीष्म ऋतु में जंगलों की आग से युवा और पुराने दोनों वनों को नुकसान पहुँचता है। इसके लिए सामुदायिक भागीदारी ज़रूरी है।

छत्तीसगढ़ की जलवायु और अर्थव्यवस्था, दोनों ही जंगलों पर निर्भर हैं। युवा जंगल तेजी से बढ़ते हैं और अल्पकालीन कार्बन अवशोषण में सहायक हैं, परंतु पुराने जंगलों का कोई विकल्प नहीं है। यदि राज्य अपने पुराने कार्बन-समृद्ध वनों को सुरक्षित रखते हुए युवा वनों का प्रबंधन सही ढंग से करता है, तो यह न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे भारत के लिए जलवायु संतुलन का आदर्श मॉडल बन सकता है।

पुराने वनों का कोई विकल्प नहीं

युवा वन अल्पकालिक कार्बन अवशोषण में सहायक हैं, परंतु पुराने वन स्थायी कार्बन बैंक और जैव विविधता के असली संरक्षक हैं। यदि छत्तीसगढ़ केवल युवा वनों पर निर्भर रहा तो नेट कार्बन हानि निश्चित है। इसलिए नीति यह होनी चाहिए कि पुराने वनों को संरक्षित किया जाए और युवा वनों का सतत प्रबंधन किया जाए, जिससे राज्य कार्बन संतुलन और जलवायु स्थिरता दोनों में आदर्श मॉडल बन सके।

अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर

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