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फीस नहीं भरी, तो परीक्षा से बाहर,सेफर स्कूल की कार्रवाई से हड़कंप….

बिलासपुर में शिक्षा पर आर्थिक प्रहार,छात्राओं को परीक्षा में बैठने से रोका….

पैसे की मार ने रोक दी पढ़ाई,सेफर स्कूल में छात्राएं परीक्षा से वंचित….

आर्थिक तंगी का दर्द-रोते हुए घर लौटे बच्चे, परीक्षा देने से रोका….

29 महीने से शिक्षकों को वेतन नहीं-स्कूल का बड़ा खुलासा….

बिलासपुर ।पढ़ाई… हर बच्चे का हक। लेकिन सोचिए, अगर पैसों की कमी किसी बच्चे का यह हक छीन ले, तो इससे बड़ा दुख और क्या हो सकता है? बिलासपुर के मुंगेली नाका चौक से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने सभी को हिला दिया है। यहां के सेफर स्कूल में फीस नहीं भर पाने पर कई छात्राओं को परीक्षा बैठने से रोक दिया गया। जी हां—पैसे की मजबूरी ने बच्चों की कलम रोक दी, और यह घटना अब चर्चा का बड़ा विषय बन चुकी है।

दरअसल पीड़ित छात्राओं और उनके परिजनों ने मीडिया को बताया कि आर्थिक स्थिति बहुत खराब है। घर की परिस्थितियां ऐसी नहीं हैं कि समय पर फीस जमा कर सकें। इसके लिए वे लगातार स्कूल प्रबंधन से निवेदन करते रहे, बार-बार गुहार लगाते रहे, लेकिन प्राचार्य और प्रबंधन ने साफ कह दिया फीस नहीं, तो परीक्षा भी नहीं।इतना ही नहीं, कुछ पालकों का आरोप है कि बच्चों को लगातार इस तरह मानसिक रूप से परेशान किया जाता था कि वे रोते हुए घर तक पहुंचते थे। बच्चों के आंसू देखकर माता-पिता ने स्कूल जाकर फिर विनती की लेकिन नतीजा वही… फीस नहीं, तो कोई राहत नहीं।एक पालक ने तो यह भी बताया कि फीस बकाया होने के कारण उनके बच्चे का 10वीं का ओरिजिनल रिज़ल्ट तक स्कूल ने रोक रखा है। जबकि नियम साफ कहते हैं कि रिज़ल्ट किसी भी हालत में रोका नहीं जा सकता। लेकिन यहां पैसे की मार ने बच्चों का भविष्य तक थाम दिया। जब यह पूरा मामला स्कूल के प्राचार्य के सामने रखा गया तो उन्होंने अपनी मजबूरी बताई। उनका कहना था कि स्कूल भारी घाटे में चल रहा है। पिछले 29 महीनों से न तो प्राचार्य को सैलरी मिली है, न ही शिक्षिकाओं को। इसलिए फीस के प्रति सख्ती बरतना उनकी मजबूरी है। हालांकि दबाव बढ़ने के बाद प्राचार्य ने कहा फिलहाल बच्चों को परीक्षा देने दी जाएगी।
अब बड़ा सवाल यही है.क्या यह सिर्फ एक आश्वासन है, या सच में बच्चों को परीक्षा में बैठने दिया जाएगा? क्या इन मासूमों को पढ़ाई का हक मिलेगा, या पैसे की दीवार फिर उनके सपनों को रोक देगी?पढ़ाई को व्यापार बनने से कैसे रोका जाए यह सोचने का समय आ चुका है। देश में हर बच्चा पढ़ सके, यह सिर्फ आदर्श नहीं, यह हक है। ऐसे में फीस की वजह से बच्चों को परीक्षा से रोकना कितना सही है।इस पर सवाल उठने लाज़मी हैं।अब नज़रें इस बात पर टिकी हैं कि स्कूल प्रबंधन बच्चों को न्याय देता है या फिर वही पुरानी कहानी आश्वासन, और फिर निराशा।फ़िलहाल, माता-पिता और छात्राएं उम्मीद लगाए बैठे हैं कि उनके भविष्य को पैसे की कमी की वजह से अंधेरे में नहीं धकेला जाएगा। आगे क्या होगा… यह आने वाला वक्त बताएगा।

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