घास और झाड़ियों के नीचे छिपा जल भंडार: वनांचलों में मिले नए प्राकृतिक जल संकेतक

बिलासपुर— अब झाड़ियों और घास के नीचे छिपे जल के अकूत भंडार से लोगों की प्यास बुझाई जा सकेगी। बस्तर, सरगुजा और कोरिया के वनांचल क्षेत्रों में घास और झाड़ियों की ऐसी पाँच प्रजातियाँ पहचानी गई हैं, जो सूखे दिनों में भी जल संकट से राहत दिलाने में सक्षम हैं।
अब तक पीपल, अर्जुन, करंज, जामुन, बरगद, कुम्ही और जंगली खजूर को भूमिगत जल भंडार का संकेत देने वाले वृक्षों के रूप में जाना जाता रहा है। नवीन अनुसंधानों के आधार पर अब घास की तीन तथा झाड़ियों की दो प्रजातियाँ भी इस सूची में शामिल की जा रही हैं, जिन्हें प्रदेश के वनांचलों में प्रकृति प्रदत्त अनमोल जल संकेतक के रूप में मान्यता मिली है।

खास है यह घास
कांस घास सामान्यतः नदी तटों पर पाई जाती है और इसके होने से नीचे प्रचुर जल भंडार की उपस्थिति का संकेत मिलता है।
खस घास अपनी अद्भुत जल संरक्षण क्षमता के लिए जानी जाती है। इसकी मौजूदगी से मिट्टी में नमी की संतुलित मात्रा बनी रहती है, जिससे जल संरक्षण और भूमिगत जल भंडार की स्थिति सामान्य रहती है।
जल संकेतक झाड़ियाँ
अनुसंधानों में सबसे अनोखी झाड़ी नरकट पाई गई है, जिसे स्थायी जल भंडार की सूचक झाड़ी के रूप में मान्यता प्राप्त है। यह गुण हर मौसम में बना रहता है।
वहीं मोथा या नागर मोथा उथले जल भंडार की उपस्थिति का संकेत देती है, जिससे ग्रीष्मकाल के शुरुआती दिनों में होने वाले जल संकट से राहत मिल सकती है।

जल की स्थिति बताने वाले जलीय पौधे
कमल की उपस्थिति स्थिर और स्वच्छ जल का संकेत मानी जाती है, जबकि कुमुदिनी यह दर्शाती है कि जल सेवन योग्य नहीं है।
जल घास तालाबों के जल स्तर को बनाए रखने में सहायक होती है, वहीं सिंघाड़ा शांत जल क्षेत्र की पहचान कराता है। इसके विपरीत, जलकुंभी की अधिकता पानी के अत्यधिक प्रदूषित और पोषक तत्वों से भरपूर होने का संकेत मानी जाती है।

प्राकृतिक वनस्पतियाँ हैं जल संकट से निपटने का समाधान
पीपल, अर्जुन, जामुन, कुम्ही, कांस घास, खस, नरकट और मोथा जैसी प्रजातियाँ प्राकृतिक जल संकेतक हैं, जो भूमिगत जल भंडार की उपस्थिति और स्थायित्व का स्पष्ट संकेत देती हैं। इन वनस्पतियों का संरक्षण और वैज्ञानिक प्रबंधन जल स्रोतों की पहचान, संरक्षण और पुनर्जीवन में सहायक हो सकता है। पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक वानिकी को जोड़कर जल संकट से निपटने के साथ-साथ सतत विकास और आजीविका के नए अवसर भी सृजित किए जा सकते हैं।
अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर