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लिंगियाडीह आंदोलन 62वें दिन भी अडिग, नेताओं व समाजसेवियों की एकजुटता से बढ़ा दबाव, सरकार पर अनदेखी के आरोप तेज

बिलासपुर।
लिंगियाडीह क्षेत्र में चल रहा जन आंदोलन 62वें दिन भी पूरी मजबूती के साथ जारी है। लंबा समय बीत जाने के बावजूद आंदोलनकारियों की मांगों पर किसी ठोस कार्रवाई का अभाव अब खुलकर सवालों के घेरे में है। इसी बीच आंदोलन को नया आयाम देते हुए अल्पसंख्यक समाज, सामाजिक संगठनों और क्षेत्र के प्रभावशाली चेहरों ने खुला समर्थन सामने रखा है, जिससे आंदोलन की धार और तेज होती दिख रही है।
आंदोलन स्थल पर बढ़ती भीड़ और लगातार हो रही सभाओं ने साफ कर दिया है कि यह केवल स्थानीय असंतोष नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक सरोकार से जुड़ा मुद्दा बन चुका है। आंदोलनकारियों का कहना है कि वे लंबे समय से शांतिपूर्ण तरीके से अपनी जायज़ मांगों को सामने रख रहे हैं, लेकिन शासन-प्रशासन की चुप्पी ने नाराजगी को और गहरा दिया है।
इसी कड़ी में वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता चित्रसेन श्रीवास ने आंदोलन को जनभावनाओं की अभिव्यक्ति बताया, जबकि आशीष गोयल ने इसे अधिकारों की लड़ाई करार दिया। अल्पसंख्यक समाज की ओर से आसिफ खान ने कहा कि जनता की आवाज़ को लगातार नजरअंदाज किया जाना लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। वहीं राजू खटीक ने आंदोलन की निरंतरता को जनता के धैर्य और संकल्प का प्रतीक बताया।
समर्थन में सामने आए अन्य समाजसेवियों में कमलेश दुबे, श्याम मूरत कौशिक और डॉ. रघु साहू ने भी आंदोलन को नैतिक और सामाजिक समर्थन दिया। इन सभी का कहना रहा कि लिंगयाडीह का यह आंदोलन अब केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह आम नागरिकों के अधिकारों और सम्मान से जुड़ा विषय बन चुका है।
लगातार मिल रहे समर्थन और विभिन्न वर्गों की भागीदारी से आंदोलन को नई ऊर्जा मिलती दिख रही है। आंदोलन स्थल पर मौजूद लोगों का कहना है कि जब तक उनकी मांगों को गंभीरता से नहीं लिया जाता, तब तक संघर्ष की यह आवाज़ यूं ही बुलंद रहती दिखाई।

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