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मुरुम के नाम पर कितना खर्च? जानकारी मांगते-मांगते पहुंच गए राज्य सूचना आयोग तक….

कोरबा:- गाँव की पगडंडियों से लेकर मुख्य सड़कों तक जब मुरुम डाली जाती है, तो ग्रामीणों को उम्मीद होती है कि अब रास्ता मजबूत होगा, आवाजाही आसान होगी और विकास की गाड़ी आगे बढ़ेगी। लेकिन जब उसी मुरुम कार्य के नाम पर हुए खर्च का हिसाब मांगने पर पूरी और प्रमाणित जानकारी न मिले, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। आज ऐसा ही मामला ग्राम पंचायत अमझर (अ.), जनपद पंचायत पोंडी उपरोड़ा में सामने आया है, जहाँ वित्तीय वर्ष 2024-25 के मुरुम कार्य को लेकर पारदर्शिता पर प्रश्नचिन्ह लग गया है।
ग्राम कोरबी (सी.) निवासी अजय दास महंत ने 16 सितंबर 2025 को सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 6(1) व 6(3) के तहत आवेदन देकर पंचायत क्षेत्र में कराए गए मुरुम कार्य—सड़क भराई, समतलीकरण एवं मार्ग सुधार—से संबंधित संपूर्ण जानकारी मांगी। उन्होंने केवल सामान्य जानकारी नहीं, बल्कि ठोस दस्तावेजों की मांग की। आवेदन में मुरुम कार्य हेतु राशि भुगतान की बिल बाउचर की प्रमाणित प्रतियां मांगी गईं।

कानून स्पष्ट है। सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 7(1) के अनुसार 30 दिनों के भीतर सूचना देना अनिवार्य है। यदि सूचना देने से इंकार किया जाता है तो धारा 7(2) के तहत लिखित रूप में स्पष्ट कारण बताना आवश्यक होता है। लेकिन आवेदक का आरोप है कि या तो समयसीमा का पालन नहीं हुआ या फिर अधूरी और अप्रमाणित जानकारी देकर औपचारिकता निभा दी गई। प्रमाणित प्रतियां उपलब्ध नहीं कराई गईं, जिससे खर्च की वास्तविकता पर संदेह बना हुआ है।
जब संतोषजनक जानकारी नहीं मिली तो 14 अक्टूबर 2025 को धारा 19(1) के तहत प्रथम अपील दायर की गई। 17 नवंबर 2025 को मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जनपद पंचायत पोंडी उपरोड़ा द्वारा अपील प्रकरण क्रमांक 34 में सुनवाई की गई। सुनवाई में दोनों पक्षों की उपस्थिति दर्ज की गई और आदेश में 15 दिवस के भीतर जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया। इसके बाद प्रकरण को नस्तीबद्ध कर दिया गया।
लेकिन यहीं से मामला और गंभीर हो गया। आवेदक का कहना है कि 15 दिन का स्पष्ट निर्देश होने के बावजूद मुरुम कार्य से संबंधित संपूर्ण एवं प्रमाणित अभिलेख उपलब्ध नहीं कराए गए। यदि आदेश का पालन नहीं हुआ, तो यह केवल सूचना देने में लापरवाही नहीं, बल्कि आदेश की अवहेलना का भी मामला बनता है।
प्रथम अपील से राहत न मिलने पर अजय दास महंत ने अब धारा 19(3) के तहत राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील दायर कर दी है। अपील में धारा 7(1) के उल्लंघन, अधूरी जानकारी, प्रमाणित प्रतियां न देने तथा पारदर्शिता में कमी का उल्लेख किया गया है। साथ ही धारा 20 के तहत दंडात्मक कार्रवाई की मांग की गई है। कानून के अनुसार, यदि सूचना देने में जानबूझकर देरी या लापरवाही सिद्ध होती है तो संबंधित अधिकारी पर प्रतिदिन 250 रुपये के हिसाब से अधिकतम 25 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
गांव में अब इसकी चर्चा तेज हो गई है,लोग पूछ रहे हैं—मुरुम कितनी डाली गई? किस दर पर खरीदी गई? भुगतान किसे और कितनी राशि का हुआ? माप पुस्तिका में वास्तविक लंबाई और मोटाई क्या दर्ज है? यदि सब कुछ नियमों के अनुरूप हुआ है, तो दस्तावेज दिखाने में संकोच क्यों?
ग्रामीण क्षेत्रों में मुरुम कार्य छोटे स्तर का काम नहीं होता। कई बार लाखों रुपये खर्च होते हैं। ऐसे में पारदर्शिता और जवाबदेही अत्यंत आवश्यक है। सूचना का अधिकार अधिनियम का उद्देश्य ही यही है कि जनता अपने पैसों से हुए कार्यों का हिसाब मांग सके।
यह मामला केवल एक सड़क या मुरुम की परत का नहीं है। यह मामला उस विश्वास का है जो ग्रामीण जनता प्रशासन पर करती है। यदि रिकॉर्ड पारदर्शी होगा तो संदेह अपने आप खत्म हो जाएगा। लेकिन यदि जानकारी देने में टालमटोल होती रही, तो अविश्वास और गहरा होगा।
अब सबकी निगाहें राज्य सूचना आयोग की आगामी सुनवाई पर टिकी हैं। क्या आयोग सख्त रुख अपनाएगा? क्या संबंधित अधिकारियों से जवाब-तलब होगा? क्या मुरुम कार्य का पूरा सच दस्तावेजों के साथ सामने आएगा?
गांव के लोग इंतजार में हैं—देखना यह है कि मुरुम की परतों के नीचे दबा सच बाहर आता है या फिर फाइलों की धूल में ही दबा रह जाता है।

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