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लंबी हिरासत पर हाईकोर्ट की टिप्पणी, अनिल टुटेजा को जमानत….दूसरी जमानत याचिका मंजूर, सुप्रीम कोर्ट की दी गई स्वतंत्रता का लाभ…18 माह से अधिक न्यायिक हिरासत; ट्रायल अब तक प्रारंभ नहीं

7 चालान, 51 आरोपी, 1,111 गवाह; अभियोजन स्वीकृति लंबित

केवल लंबी कैद और विलंब के आधार पर राहत, मेरिट पर कोई निष्कर्ष नहीं

रायपुर/बिलासपुर/
कथित बहुचर्चित शराब घोटाला प्रकरण में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने पूर्व वरिष्ठ अधिकारी अनिल टुटेजा को नियमित जमानत प्रदान कर दी है। न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा की एकलपीठ ने मंगलवार को पारित विस्तृत आदेश में कहा कि जब ट्रायल के निकट भविष्य में पूरा होने की संभावना नहीं हो और आरोपी लंबे समय से न्यायिक हिरासत में हो, तब व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

यह टुटेजा की दूसरी जमानत याचिका थी। इससे पूर्व उनकी अर्जी खारिज हो चुकी थी, किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने जांच की प्रगति को देखते हुए पुनः जमानत याचिका दायर करने की स्वतंत्रता प्रदान की थी। उच्च न्यायालय ने माना कि परिस्थितियों में पर्याप्त परिवर्तन हुआ है, क्योंकि आरोप पत्र दाखिल होने के बावजूद ट्रायल आगे नहीं बढ़ सका है।

अदालत ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध तथ्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि आवेदक 21 अगस्त 2024 से वर्तमान प्रकरण में हिरासत में है। इससे पहले वह प्रवर्तन निदेशालय की कार्यवाही में भी समान लेनदेन से जुड़े आरोपों में बंद रहा। कुल मिलाकर उसकी हिरासत अवधि लगभग 23 माह के आसपास पहुंच चुकी है।

मामले में अब तक सात आरोप पत्र प्रस्तुत किए जा चुके हैं। अभियोजन ने 51 व्यक्तियों को आरोपी बनाया है और 1,111 गवाहों को पेश करने का प्रस्ताव रखा है। दस्तावेजी साक्ष्य हजारों पृष्ठों में है। न्यायालय ने कहा कि इतनी व्यापक और बहुस्तरीय सुनवाई स्वाभाविक रूप से लंबा समय लेगी। वर्तमान स्थिति में न तो विशेष न्यायालय ने संज्ञान लिया है और न ही आरोप तय हुए हैं, क्योंकि अभियोजन स्वीकृति अभी प्राप्त नहीं हुई है।

आदेश में स्पष्ट कहा गया कि जब संज्ञान और आरोप गठन ही लंबित हों, तब ट्रायल प्रारंभ होने की समयसीमा अनिश्चित हो जाती है। ऐसे में आरोपी को अनिश्चितकाल तक जेल में रखना अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के विपरीत होगा।

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि प्रकरण का साक्ष्य मुख्यतः दस्तावेजी प्रकृति का है, जिसे जांच एजेंसी जब्त कर चुकी है। आवेदक से किसी प्रकार की नकद राशि, अवैध संपत्ति या अन्य आपत्तिजनक सामग्री की बरामदगी नहीं हुई है। इस पहलू को भी न्यायालय ने जमानत के पक्ष में एक प्रासंगिक तथ्य माना।

उच्च न्यायालय ने दोहराया कि जमानत का सिद्धांत दंडात्मक नहीं बल्कि उपस्थिति सुनिश्चित करने का माध्यम है। गंभीर आरोप मात्र से जमानत का स्वतः निषेध नहीं किया जा सकता, विशेषकर तब जब सुनवाई की प्रक्रिया लंबी और अनिश्चित हो।

हालांकि, न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि जमानत केवल लंबी हिरासत और ट्रायल में संभावित विलंब के आधार पर दी गई है। आदेश में आरोपों के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की गई है और पूर्व में पारित आदेशों की गंभीर टिप्पणियां अप्रभावित रहेंगी।

अदालत ने टुटेजा को Rs 1 लाख के निजी मुचलके और सममूल्य जमानतदार प्रस्तुत करने पर रिहा करने का निर्देश दिया है। पासपोर्ट जमा करना, जांच व ट्रायल में सहयोग करना, गवाहों को प्रभावित न करना तथा बिना अनुमति देश न छोड़ना जैसी शर्तें लागू रहेंगी। शर्तों के उल्लंघन पर अभियोजन को जमानत निरस्तीकरण के लिए आवेदन करने की स्वतंत्रता दी गई है।

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