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भीषण गर्मी में 138 दिन से न्याय की आस: फैसले से पहले ड्रोन से पहुंचा नोटिस, लिंगियाडीह के परिवारों की आस “हाईकोर्ट से

बिलासपुर। भीषण गर्मी के बीच पिछले 138 दिनों से अपने आशियाने को बचाने और न्याय की मांग को लेकर धरने पर बैठे लिंगियाडीह क्षेत्र के गरीब परिवारों का संघर्ष अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। जहां एक ओर इन परिवारों की उम्मीदें हाई कोर्ट के आने वाले फैसले पर टिकी हैं, वहीं दूसरी ओर प्रशासन द्वारा ड्रोन के माध्यम से नोटिस भेजे जाने की घटना ने पूरे मामले को और भी संवेदनशील और चर्चित बना दिया है।
धरने पर बैठे परिवारों का कहना है कि वे लंबे समय से यहां के लोग पत्ता की मांग कर रहे थे और कांग्रेस शासन काल में इन्हें पट्टा वितरण करने की कार्रवाई की गई। पैसा भी निगम ने जमा किया । लेकिन अभी तक पट्टा आवंटन नहीं किया गया। जबकि लिंगियाडीह टाउन एवं कंट्री प्लानिंग के अनुसार आबादी भूमि है। यहां की महिला शांतिपूर्ण एंतरीके से अपनी मांगों को रख रहे हैं। तपती धूप, लू और कठिन परिस्थितियों के बावजूद महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग लगातार डटे हुए हैं। उनका कहना है कि यह सिर्फ जमीन या मकान का मुद्दा नहीं, बल्कि उनके जीवन और भविष्य का सवाल है।
परिवारों ने प्रशासन के इस कदम पर नाराजगी जताते हुए कहा कि जब वे खुले में धरना दे रहे हैं, तो उनसे सीधे संवाद करने के बजाय ड्रोन के जरिए नोटिस भेजना अमानवीय और मानसिक दबाव बनाने जैसा है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या प्रशासन अब तकनीक के सहारे संवेदनशील मुद्दों को निपटाना चाहता है?
धरना में बैठे पीड़ित परिवारों का आरोप है कि उन्हें लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है और उनकी समस्याओं का कोई ठोस समाधान अब तक सामने नहीं आया है। इसके बावजूद वे न्याय की उम्मीद में डटे हुए हैं और हाई कोर्ट के फैसले का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक भावनात्मक मोड़ भी ले लिया है। “चिराग रोशन होगा या उससे पहले झोपड़ियां जल उठेंगी” — यह सवाल अब हर लिंगियाडीह मैं रहने वाले परिवारों में है। लिंगियाडीह के ये परिवार अपनी उम्मीद भरी निगाहों से न्यायपालिका की ओर देख रहे हैं, लेकिन हालात ऐसे हैं मानो उनकी उम्मीदों पर किसी की नजर लग गई हो।
138 दिनों से जारी इस आंदोलन को अब व्यापक समर्थन मिलने लगा है। समाज के विभिन्न वर्गों के साथ-साथ कई सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों ने भी खुलकर समर्थन दिया है। लोग भावनात्मक रूप से इन परिवारों से जुड़ते जा रहे हैं और उनकी लड़ाई को अपनी आवाज बना रहे हैं।
अब सभी की निगाहें हाई कोर्ट के फैसले पर टिकी हैं। यह फैसला न सिर्फ इन परिवारों के भविष्य को तय करेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि क्या गरीबों को उनके हक के लिए इतनी लंबी लड़ाई लड़नी पड़ेगी या उन्हें समय पर न्याय मिल पाएगा।, भीषण गर्मी, अनिश्चितता और प्रशासनिक दबाव के बीच लिंगियाडीह के ये परिवार अपने हौसले के साथ डटे हुए हैं—इस उम्मीद में कि न्याय जरूर मिलेगा, और उनके घरों के चिराग बुझने नहीं दिए जाएंगे।

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