मानक आकार से छोटा हो सकता है हापुस, कम रसीला और स्वाद में फीका होने की आशंका है दशहरी और लंगड़ा आम

बिलासपुर- मानक आकार से छोटा हो सकता है हापुस। कम रसीला और स्वाद में फीका होने की आशंका है दशहरी और लंगड़ा आम। चौसा के उत्पादन में 30 से 35 फीसदी गिरावट के प्रबल आसार हैं।
तापमान में वृद्धि, अनियमित वर्षा और चरम मौसमी घटनाएं जैसे जलवायु परिवर्तन का असर अब तैयार हो रही आम की फसल पर दिखने लगा है। चिंता में वानिकी वैज्ञानिक इसलिए हैं क्योंकि आम उत्पादक क्षेत्र से आ रही खबरों में इस बार फसल में 30 से 35% गिरावट की आशंका है।

बदल रहा पुष्पन चक्र
जलवायु परिवर्तन के इस दौर में तापमान का जैसा स्तर बना हुआ है, उससे पुष्पन चक्र में तेजी से बदलाव आ रहा है। जल्द फलन की जैसी स्थितियां बनी हुई हैं, उससे फलों का लगना समय से पहले देखा जा रहा है, तो यह जल्द गिर भी जा रहे हैं। चिंता इसलिए ज्यादा है क्योंकि कई क्षेत्रों में पुष्पन और फलन की पूरी प्रक्रिया बाधित हो चुकी है।

न्यौता कीट प्रकोप को
जल्द परिपक्वता अवधि की वजह से थ्रिप्स, फ्रूट फ्लाई और पाउडरी मिल्ड्यू जैसे कीटों को तैयार होती फसल में प्रवेश का माकूल मौका मिल रहा है। जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान के बाद यह तीसरी स्थिति भी आम की फसल लेने वाले किसानों को व्यापक नुकसान पहुंचा सकती है क्योंकि कीट प्रकोप पर नियंत्रण का समय अब किसानों के पास नहीं है।

गुणवत्ता पर यह असर
प्रतिकूल मौसम में तैयार हो रही आम की फसल में गुणवत्ता कमजोर होने की प्रबल आशंका है। इसे फीका स्वाद, कम रसीला और कमजोर गुणवत्ता के रूप में देखा जाएगा। साथ ही पोषण गुणवत्ता में भी कमी आने की आशंका है। महत्वपूर्ण तथ्य यह कि न केवल आकार छोटा होगा बल्कि रंग भी आकर्षक नहीं होगा। यह दोनों स्थितियां कमजोर निर्यात की वजह बनेंगी।
खतरे में यह प्रजातियां
अल्फांसो, दशहरी, लंगड़ा और चौसा आम की वह प्रजातियां हैं, जो इस वक्त जलवायु परिवर्तन के दौर में सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहीं हैं। इसके अलावा बैगन फली और सुंदरी जैसी प्रजातियां भी संकट की जद में हैं। बताते चलें कि देश में 20 से 24 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में आम की व्यावसायिक खेती होती है।
वर्जन
उत्पादन घटेगा, स्वाद एवं गुणवत्ता भी होगी प्रभावित
वर्तमान जलवायु परिवर्तन की परिस्थितियों में आम की फसल पर बहुआयामी प्रभाव पड़ रहा है। तापमान वृद्धि और अनियमित वर्षा से पुष्पन एवं फलन चक्र असंतुलित हो रहा है, जिससे उत्पादन और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हो रहे हैं। यदि समय रहते समुचित प्रबंधन उपाय—जैसे जल संरक्षण, सूक्ष्म जलवायु प्रबंधन और समेकित कीट नियंत्रण—नहीं अपनाए गए, तो आम उत्पादन में दीर्घकालिक गिरावट देखी जा सकती है।
अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर