GPM में ‘संलग्नीकरण’ के बहाने बड़ा प्रशासनिक उलटफेर—एक दिन में बदली कमान, आदेशों पर उठे सवाल

CEO हटे, नई तैनाती तत्काल लागू—क्या जिला स्तर ने तय कर दी अपनी अलग प्रशासनिक लाइन?
2015 के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद जिला स्तर पर बदलाव, प्रशासनिक प्रक्रिया पर उठे गंभीर सवाल
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही।
जिले में 11 मार्च 2026 को जारी प्रशासनिक आदेशों ने पूरे सिस्टम में हलचल मचा दी है। एक ही दिन में जनपद पंचायतों के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों (CEO) को हटाकर नई व्यवस्थाएं लागू कर दी गईं, जिससे अब यह मामला “संलग्नीकरण बनाम शासन आदेश” के टकराव के रूप में देखा जा रहा है।
जारी आदेशों के तहत गौरेला जनपद पंचायत में पदस्थ CEO को उनके मूल पद से हटाकर अन्य विभाग में संलग्न कर दिया गया, वहीं उनकी जगह दूसरे अधिकारी को प्रभारी CEO की जिम्मेदारी सौंप दी गई। दूसरी ओर पेंड्रा जनपद पंचायत में डिप्टी कलेक्टर को ही प्रभारी CEO बना दिया गया, जबकि पूर्व में पदस्थ अधिकारी को जिला पंचायत में अटैच कर दिया गया।
एक ही दिन में दोनों जनपद पंचायतों के शीर्ष पदों पर इस तरह का बदलाव यह संकेत देता है कि यह कोई सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक बड़ा और योजनाबद्ध फेरबदल है।
इस पूरे मामले को लेकर सबसे बड़ा सवाल नियमों के पालन को लेकर उठ रहा है। छत्तीसगढ़ शासन के सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा 30 अक्टूबर 2015 को जारी स्पष्ट निर्देशों में कहा गया है कि यदि किसी पद पर शासन स्तर से पदस्थापना हो जाती है, तो जिला स्तर पर की गई कोई भी “स्थानीय व्यवस्था” या संलग्नीकरण तत्काल समाप्त माना जाएगा और नए अधिकारी को कार्यभार सौंपना अनिवार्य होगा।
इसके बावजूद वर्तमान घटनाक्रम में जिस तरह पदस्थ अधिकारियों को हटाकर नई जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं, उसने इस आदेश की अनदेखी की आशंका को जन्म दिया है। जानकारों का मानना है कि “संलग्नीकरण” का उपयोग आमतौर पर अस्थायी व्यवस्था के रूप में किया जाता है, लेकिन यहां जो बदलाव हुए हैं, वे स्थायी फेरबदल जैसे नजर आ रहे हैं।
सबसे ज्यादा चर्चा पेंड्रा में डिप्टी कलेक्टर को CEO की जिम्मेदारी सौंपे जाने को लेकर हो रही है। इसे प्रशासनिक परंपरा से अलग कदम माना जा रहा है, जिससे यह बहस तेज हो गई है कि क्या यह केवल तात्कालिक व्यवस्था है या फिर प्रशासनिक प्राथमिकताओं में बदलाव का संकेत।
इन आदेशों के बाद जिले में प्रशासनिक स्तर पर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। अधिकारी वर्ग में इसे लेकर चर्चा और असंतोष की बातें सामने आ रही हैं, वहीं राजनीतिक गलियारों में भी यह मामला तूल पकड़ता जा रहा है। हालांकि अब तक जिला प्रशासन की ओर से इस पूरे घटनाक्रम पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं आया है।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या छत्तीसगढ़ शासन इस मामले में हस्तक्षेप करेगा। यदि शासन स्तर पर संज्ञान लिया जाता है, तो इन आदेशों की समीक्षा या निरस्तीकरण की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
फिलहाल, GPM में “संलग्नीकरण” के नाम पर हुआ यह फेरबदल एक बड़ा प्रशासनिक विवाद बन चुका है, जिसने यह सवाल खड़ा कर दिया है—
क्या यह कदम प्रशासनिक जरूरत के तहत उठाया गया,
या फिर स्थापित नियमों की सीमा से बाहर जाकर लिया गया निर्णय है?