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आस्था और ध्यान से रोगों और कष्टों का अंत

सचिव महंत जगतार मुनि ने साझा किया स्वास्थ्य लाभ का अनुभव

मनेन्द्रगढ़ – ‘स्वस्थ विश्व, भयमुक्त मानवता’ के संकल्प के साथ कानपुर स्थित करौली शंकर महादेव धाम में विगत दिनों बैशाख अमावस्या के पावन अवसर पर निःशुल्क ‘आनंद दरबार’ का भव्य आयोजन हुआ। श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर पूर्ण गुरु श्री करौली शंकर महादेव जी के सानिध्य में आयोजित इस दरबार में देश के विभिन्न राज्यों से आए हजारों श्रद्धालुओं ने ध्यान और संकल्प के माध्यम से असाध्य रोगों, मानसिक कष्टों और भय से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया।
इस गरिमामयी अवसर पर श्री पंचायती अखाड़ा बड़ा उदासीन निर्वाण के सचिव महंत श्री जगतार मुनि जी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे, उन्होंने जनसमूह के सम्मुख अपना व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए बताया कि वे रीढ़ की हड्डी (L4-L5) की गंभीर समस्या से लंबे समय से पीड़ित थे। देश के नामी अस्पतालों में इलाज के बावजूद उन्हें राहत नहीं मिली।


“जब मेरी मुलाकात हरिद्वार में पूर्ण गुरु श्री करौली शंकर महादेव जी से हुई और मैंने अपनी व्यथा रखी,तब गुरुदेव के आशीर्वाद और धाम की दिव्य पद्धति से मैं आज पूर्णतः स्वस्थ हूँ। भ्रम फैलाने वालों की परवाह न कर मेरा अटूट विश्वास ही मेरी शक्ति बना।” – महंत श्री जगतार मुनि जी
करौली शंकर महादेव धाम की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ का ‘निशुल्क आनंद दरबार’ है। यहाँ समाज का हर वर्ग—चाहे वह उच्च पदस्थ नौकरशाह हो, राजनीतिज्ञ हो या साधारण नागरिक—एक ही कतार में बैठकर ईश्वर द्वारा प्रदत्त आनंद का अनुभव करता है। धाम की मान्यता है कि भक्त अपने ‘दृढ़ संकल्प’ और ‘प्रार्थना’ से स्वयं को स्वस्थ महसूस करने लगता है।


“उदासीनता: शून्यता नहीं, बल्कि अनंत का विस्तार”:: पूर्ण गुरु श्री करौली शंकर महादेव
श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर पूर्ण गुरु श्री करौली शंकर महादेव जी ने उदासीन अखाड़े से सम्बंधित “उदासीन” शब्द का अर्थ समझाया |उन्होंने बताया कि ‘उदासीन’ का अर्थ निष्क्रियता नहीं है, बल्कि ‘तटस्थता’ है। ब्रह्मांड में जो ‘व्यापक’ है,वह स्वयं कोई क्रिया नहीं करता,लेकिन ब्रह्मांड की हर क्रिया उसी के भीतर होती है। जैसे एक खाली कमरा उदासीन है। वह न हिलता है, न कुछ करता है, लेकिन उसी कमरे के ‘होने’ के कारण ही हम उसमें चल-फिर सकते हैं। वह ‘आधार’ है, इसलिए वह उदासीन है।
“व्यापक वस्तु में जो समाया है वह ईश्वर है। वह शून्य या आकाश जो पृथ्वी, चाँद, सितारों और सूर्य को घेरे हुए है। यह इतना ‘व्यापक’ है कि इसकी सीमाओं का अंत नहीं। इस व्यापकता के भीतर जो ऊर्जा, जो चेतना कार्य कर रही है, वही ‘ईश्वर’ या ‘ऐश्वर्य’ है। यह वह ‘स्टेज’ है जिस पर सृष्टि का नाटक चल रहा है। अभिनेता (ग्रह, नक्षत्र, जीव) क्रिया करते हैं, लेकिन स्टेज (उदासीन तत्व) स्वयं क्रियाशून्य रहकर सबको स्थान देता है।
आपने स्पष्ट किया कि वह ‘कर्ता’ नहीं है लेकिन उसके बिना कुछ भी संभव नहीं है,हम और आप जो ‘पदार्थ’ हैं, हमारा अस्तित्व केवल इसलिए है क्योंकि वह ‘व्यापक उदासीन तत्व’ हमें जगह दे रहा है।
पूर्ण गुरु जी ने कहा कि जब हम ‘उदासीन अखाड़ा’ की बात करते हैं, तो यहाँ ‘उदासीन’ का अर्थ है—वह साधक जो संसार की माया और विकारों से ‘तटस्थ’ हो चुका है। जैसे वह ‘व्यापक आकाश’ सबको घेरे हुए है पर किसी से लिप्त नहीं होता, वैसे ही उदासीन संप्रदाय के साधक संसार में रहते हुए भी उससे निर्लिप्त रहते हैं। वे उसी ‘व्यापक ईश्वर’ की साधना करते हैं जो सर्वत्र है, तटस्थ है और सबका आधार है। उदासीनता ही वास्तव में पूर्णता है। जो किसी एक क्रिया में नहीं बंधा, वही ‘व्यापक’ हो सकता है। इसीलिए वह उदासीन तत्व ही सृष्टि का आदि और अंत है।
लक्ष्य: नशा मुक्त और शोक मुक्त विश्व
श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर पूर्ण गुरु श्री करौली शंकर महादेव जी ने इस अवसर पर कहा कि धाम का एकमात्र लक्ष्य पूरे विश्व को रोग,शोक,भय और नशा मुक्त करना है, उन्होंने बताया कि आनंद दरबार का आयोजन समाज के अंतिम व्यक्ति के स्वास्थ्य और सुख के लिए पूर्णतः निशुल्क रहता है। आगामी 1, 2 और 3 मई को ‘पूर्णिमा महोत्सव’ का त्रि-दिवसीय वृहद आयोजन होगा। इस महोत्सव में तंत्र-मंत्र दीक्षा और उच्च स्तरीय ध्यान साधना के माध्यम से भक्तों का कल्याण किया जाएगा।
धाम से जुड़ी यह जानकारी मन्त्र दीक्षित भक्त राधा हनी चौरसिया एवं राजेश सिंह ने दी।

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