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प्रकृति के साथ सामंजस्य और सतत विकास

अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस – 22 मई 2025 पर विशेष

बिलासपुर – प्रत्येक वर्ष 22 मई को अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिवस संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित किया गया है, जिसका उद्देश्य विश्वभर में जैव विविधता की महत्ता को रेखांकित करना और इसके संरक्षण हेतु जन-जागरूकता को बढ़ाना है। वर्ष 2025 की थीम “ प्रकृति के साथ सामंजस्य और सतत विकास” है, जो यह संदेश देती है कि मानव समाज को प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर ही विकास की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।

प्रकृति के साथ सामंजस्य का महत्व

प्रकृति मानव जीवन की आधारशिला है। पृथ्वी पर मौजूद जैव विविधता—वनस्पतियाँ, जीव-जंतु, सूक्ष्मजीव और पारिस्थितिक तंत्र—एक जटिल और संतुलित जाल का निर्माण करते हैं। यदि मानव केवल अपने विकास की ओर अग्रसर होकर इस प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ता है, तो न केवल पर्यावरणीय आपदाओं में वृद्धि होती है, बल्कि स्वयं मानव अस्तित्व भी संकट में पड़ जाता है। अतः प्रकृति के साथ सामंजस्य ही स्थायित्व और समृद्धि का आधार बन सकता है।

सतत विकास: एक अनिवार्यता

सतत विकास का तात्पर्य है ऐसा विकास जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करते हुए भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं के साथ कोई समझौता न करे। इसमें आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय पहलुओं का संतुलन अत्यंत आवश्यक होता है। प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग, अक्षय ऊर्जा का प्रोत्साहन, पारंपरिक ज्ञान की पुनर्व्याख्या, और जैव विविधता का संरक्षण सतत विकास की मूलभूत शर्तें हैं।

भारत और जैव विविधता

भारत विश्व के 17 मेगाडाइवर्स देशों में से एक है। यहाँ की भौगोलिक विविधता के कारण हिमालय, पश्चिमी घाट, पूर्वी घाट, सुंदरबन, मध्य भारत के जंगल और अंडमान-निकोबार जैसे क्षेत्र जैव विविधता के प्रमुख केंद्र हैं। भारत में लगभग 47,000 से अधिक पौधों और 89,000 से अधिक पशु प्रजातियों की पहचान की गई है। परंतु नगरीकरण, कृषि विस्तार, अवैध शिकार और जलवायु परिवर्तन के कारण यह जैव विविधता संकट में है।

जैव विविधता संरक्षण हेतु प्रयास

  1. वनीकरण और पुनर्वनीकरण: स्थानीय प्रजातियों को प्राथमिकता देते हुए वृक्षारोपण को बढ़ावा देना।
  2. संरक्षित क्षेत्र: जैव विविधता पार्क, बायोस्फीयर रिज़र्व, राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्यों को सशक्त बनाना।
  3. सामुदायिक सहभागिता: ग्राम पंचायतों, जनजातीय समुदायों और किसानों को संरक्षण के कार्यों में भागीदार बनाना।
  4. पर्यावरण शिक्षा: विद्यालयों, महाविद्यालयों और जनमाध्यमों के द्वारा जागरूकता अभियान चलाना।
  5. पारंपरिक ज्ञान का उपयोग: जैव विविधता संरक्षण में स्थानीय आस्था और पारंपरिक पद्धतियों को सम्मिलित करना।

छत्तीसगढ़ का योगदान

छत्तीसगढ़ राज्य जैव विविधता से समृद्ध है। यहाँ की वन संपदा, औषधीय पौधों की विविधता, वन्य प्रजातियाँ और पारंपरिक कृषि पद्धतियाँ प्रकृति के साथ संतुलित जीवन शैली का परिचायक हैं। बस्तर, सरगुजा, मैनपाट, गुरु घासीदास टाइगर रिज़र्व जैसे क्षेत्र जैव विविधता के हॉटस्पॉट माने जाते हैं। यहाँ की जनजातीय जीवनशैली, मिश्रित खेती, वनोपजों पर आधारित अर्थव्यवस्था प्रकृति के साथ सामंजस्य का उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस 2025 हमें यह स्मरण कराता है कि पृथ्वी पर जीवन की विविधता को बनाए रखना हम सबकी साझा जिम्मेदारी है। जब तक मानव प्रकृति को केवल उपभोग की वस्तु समझता रहेगा, तब तक संकट गहराते रहेंगे। लेकिन यदि हम उसे सहचर के रूप में स्वीकार करें, तो एक समावेशी, सतत और समृद्ध भविष्य संभव है। जैव विविधता का संरक्षण केवल पर्यावरणीय जिम्मेदारी नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व की सुरक्षा भी है।

अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर

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