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टाउन प्लानिंग का शिकंजा, बिलासपुर में अनंत रियल्टी की विकास अनुज्ञा निरस्त

पूर्व स्वीकृत अभिन्यास की भूमि को नियमानुसार संशोधन के बगैर पहुंच मार्ग के रूप में इस्तेमाल करने पर जांच में सवाल

अनुमति 60 प्रकोष्ठों की, स्वीकृत मानचित्र में कुछ स्थानों पर छह तल दर्शाने से संख्या 90, ईडब्ल्यूएस-एलआईजी गणना भी प्रभावित

उच्च पदस्थ आधिकारिक सूत्रों का दावा, आर्किटेक्ट, शपथ-पत्र, पार्किंग और ओपन स्पेस से जुड़े पहलुओं पर भी उठे गंभीर सवाल

बिलासपुर।
बिलासपुर के अज्ञेय नगर स्थित बहुमंजिला आवासीय प्रोजेक्ट में सामने आई कथित अनियमितताओं पर नगर तथा ग्राम निवेश संचालनालय ने कड़ा रुख अपनाते हुए मेसर्स अनंत रियल्टी की विकास अनुज्ञा निरस्त कर दी है। भागीदार नमन गोयल के माध्यम से संस्था को जारी विकास अनुज्ञा क्रमांक 1456 को छत्तीसगढ़ भूमि विकास नियम, 1984 के नियम 25 के तहत प्रतिसंहृत किया गया है।
25 जून 2025 को जारी विकास अनुज्ञा के संबंध में संयुक्त संचालक, नगर तथा ग्राम निवेश, बिलासपुर ने निरस्तीकरण का प्रस्ताव भेजा था। इसके बाद आवेदक संस्था को अपना पक्ष और दस्तावेज प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया। 31 जुलाई 2026 को सुनवाई के लिए बुलाए जाने पर संस्था ने 15 दिन का अतिरिक्त समय मांगा था। नमन गोयल ने 7 अगस्त को उपस्थित होकर जवाब और दस्तावेज प्रस्तुत किए। इसके बाद प्रकरण की जांच समिति के स्तर पर पड़ताल हुई और 24 अगस्त को जवाब का परीक्षण किया गया।
अंतिम आदेश में दो महत्वपूर्ण विसंगतियां स्पष्ट रूप से दर्ज हैं। पहली, जिस भूखंड को पहुंच मार्ग के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा था, वह पूर्व में स्वीकृत अभिन्यास का अभिन्न हिस्सा था और सामान्य सार्वजनिक मार्ग नहीं था। जांच समिति के अनुसार, इस भूमि को नए विकास में शामिल करने से पहले पुराने स्वीकृत अभिन्यास में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत संशोधन आवश्यक था, जिसका पालन नहीं किया गया।
दूसरा गंभीर बिंदु स्वीकृत मानचित्र में प्रकोष्ठों की संख्या से जुड़ा है। विकास अनुज्ञा में 15 ब्लॉक, प्रत्येक में चार तल और हर तल पर एक प्रकोष्ठ के हिसाब से कुल 60 प्रकोष्ठ प्रस्तावित थे। इसके विपरीत, स्वीकृत मानचित्र में कुछ स्थानों पर छह तल दर्शाए गए, जिससे संख्या 90 हो जाती है। आदेश के मुताबिक इसका प्रभाव आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और निम्न आय वर्ग के लिए निर्धारित प्रकोष्ठों की गणना पर भी पड़ता है।
अनंत रियल्टी ने इसे सलाहकार द्वारा की गई लिपिकीय नंबरिंग त्रुटि बताया। जांच समिति ने यह जवाब स्वीकार नहीं किया। समिति ने दर्ज किया कि स्वीकृति से पहले अभिन्यास पर आवेदक के हस्ताक्षर होते हैं, इसलिए उसके विवरण की जिम्मेदारी से संस्था को अलग नहीं किया जा सकता। अंततः संचालनालय ने जवाबों को असंतोषजनक और विकास अनुज्ञा की शर्तों का उल्लंघन पाया। इधर, जांच प्रक्रिया से सीधे तौर पर परिचित उच्च पदस्थ आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि पड़ताल के दौरान प्रोजेक्ट से जुड़ी प्रक्रियाओं में कथित तौर पर इस्तेमाल किए गए एक आर्किटेक्ट की वैधता, ईडब्लूएस/एलआईजी दायित्वों से संबंधित शपथ-पत्र तथा पहुंच मार्ग की चौड़ाई, पार्किंग और ओपन स्पेस संबंधी विवरणों पर भी गंभीर सवाल सामने आए। सूत्रों ने स्वीकृतियां हासिल करने के दौरान कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को कथित तौर पर छिपाने अथवा गलत ढंग से प्रस्तुत करने का भी दावा किया है। हालांकि, ये सभी आरोप तीन पृष्ठ के अंतिम निरस्तीकरण आदेश में स्वतंत्र निष्कर्ष के रूप में दर्ज नहीं हैं, इसलिए इनका उल्लेख आधिकारिक सूत्रों के दावे के रूप में किया जा रहा है।
अंतिम आदेश की प्रतियां आवास एवं पर्यावरण विभाग, बिलासपुर कलेक्टर, नगर निगम आयुक्त, छत्तीसगढ़ भू-संपदा विनियामक प्राधिकरण अनुविभागीय अधिकारी राजस्व, संयुक्त संचालक नगर तथा ग्राम निवेश और उप पंजीयक सहित संबंधित अधिकारियों को सूचना एवं आवश्यक कार्रवाई के लिए भेजी गई हैं।

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