Blog

GPM : जमीन घोटाला: जंगल की सरकारी जमीन को बनाया ‘सोने की खान’, फर्जी पट्टा, करोड़ों का लोन और ‘टॉप अफसर’ का बेमेतरा कनेक्शन से मचा हड़कंप

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही।
तहसील सकोला के ग्राम सेखवा में सामने आया जमीन घोटाला अब सिर्फ अनियमितता नहीं, बल्कि सुनियोजित सिस्टम लूट का मामला बनता जा रहा है। बड़े झाड़ जंगल मद की कीमती शासकीय भूमि को कथित रूप से फर्जी पट्टों और रिकॉर्ड में छेड़छाड़ कर निजी नाम पर दर्ज कर लिया गया—और फिर उसी जमीन पर करोड़ों का लोन उठाकर पूरे सिस्टम को खुली चुनौती दे दी गई।
इस पूरे खेल में स्थानीय शिक्षक शंकर प्रजापति और उनकी पत्नी बेबी लता के नाम सामने आ रहे हैं, लेकिन सवाल सिर्फ इन तक सीमित नहीं है—बल्कि राजस्व विभाग से लेकर बैंकिंग सिस्टम तक गहरे गठजोड़ की बू आ रही है।
मिशल में छेड़छाड़—घोटाले का ‘मास्टरस्ट्रोक’
इस घोटाले का सबसे खतरनाक पहलू है “मिशल” में बदलाव।
मिशल, जो किसी भी जमीन का मूल और अंतिम प्रमाण होता है, उसी में कथित हेरफेर कर सरकारी जंगल भूमि को निजी स्वामित्व में बदल दिया गया।
सूत्रों का दावा है:
• एक ही खसरा नंबर के दो अलग-अलग मिशल तैयार किए गए
• सरकारी जमीन को कागजों में “गायब” कर दिया गया
• और पूरी प्रक्रिया को वैध दिखाने के लिए रिकॉर्ड तक बदल दिए गए
अगर ये सच है, तो यह सिर्फ घोटाला नहीं—पूरे राजस्व सिस्टम की जड़ हिलाने वाली साजिश है।
शिकायत गायब, लोन पास—सिस्टम की मिलीभगत?

2024 में इस पूरे मामले की लिखित शिकायत जिला प्रशासन को दी गई थी। मामला कलेक्टर स्तर की TL बैठक तक पहुंचा, लेकिन कार्रवाई के बजाय:
• फाइल रहस्यमय तरीके से गायब हो गई
• जांच ठंडे बस्ते में डाल दी गई
और हैरानी की हद तब पार हुई जब:
2025 में उसी विवादित 12 एकड़ जमीन को गिरवी रखकर करोड़ों का बैंक लोन पास हो गया
बेमेतरा बैंक कनेक्शन—सबसे बड़ा सवाल
सबसे बड़ा शक यहीं से खड़ा होता है—
गौरेला, बिलासपुर, रायपुर जैसे बड़े शहरों को छोड़कर
जमीन को बेमेतरा की IDFC बैंक शाखा में ही गिरवी क्यों रखा गया?

यहीं से मामला और विस्फोटक हो जाता है, क्योंकि:
• एक ‘टॉप महिला अफसर’ का बेमेतरा से पुराना कनेक्शन बताया जा रहा है
• उसी बैंक शाखा में उनका निजी खाता होने की भी चर्चा है
हालांकि आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन यह एंगल सामने आते ही
पूरा मामला सियासी और प्रशासनिक भूचाल में बदल गया है।
शंकर प्रजापति—पुराने आरोपों की लंबी लिस्ट
स्थानीय लोगों के मुताबिक:
• शंकर प्रजापति का नाम पहले भी सरकारी जमीन मामलों में जुड़ चुका है
• ग्राम पंचायत मड़ई में फर्जी डायवर्सन के आरोप भी लगे थे
यानी यह मामला एक isolated घटना नहीं, बल्कि
पैटर्न ऑफ मैनिपुलेशन की ओर इशारा करता है।
सिस्टम पर सीधे और खतरनाक सवाल
• सरकारी जंगल भूमि निजी कैसे बन गई?
• मिशल जैसे मूल रिकॉर्ड में बदलाव किसके आदेश से हुआ?
• शिकायत के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
• फाइल किसने और क्यों गायब की?
• विवादित जमीन पर बैंक ने लोन कैसे पास किया?
• और आखिर कौन है वो ‘टॉप महिला अफसर’?
अब क्या करेगा प्रशासन?
मामला अब दबने वाला नहीं है।
जनता और स्थानीय संगठनों की मांग है:
• पूरे राजस्व रिकॉर्ड की फोरेंसिक जांच
• संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच
-बैंक लोन प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच
अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह घोटाला सिर्फ सेखवा तक सीमित नहीं रहेगा—
बल्कि यह साबित कर देगा कि सरकारी जमीन, रिकॉर्ड और सिस्टम—सब कुछ “सेटिंग” से खरीदा जा सकता है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *