युक्तियुक्तकरण घोटाले में पूर्व डीईओ टांडे दोषी, क्लर्क को क्लीनचिट
जांच समिति ने माना—प्रमोशन और युक्तियुक्तकरण में नियमों की अनदेखी कर चहेतों को पहुंचाया गया लाभ
बिलासपुर। जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) कार्यालय में युक्तियुक्तकरण और सहायक शिक्षकों की प्रधान पाठक पद पर पदोन्नति में नियमों की अनदेखी किए जाने की शिकायतों की विभागीय जांच में गड़बड़ियों की पुष्टि हुई है। तीन सदस्यीय जांच समिति ने अपनी पांच पन्नों की रिपोर्ट में तत्कालीन डीईओ विजय टांडे की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई की अनुशंसा की है। हालांकि, फाइलों की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले विधि खंड के प्रभारी लिपिक सुनील यादव के खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा नहीं की गई है।
यह मामला यशपाल कुमार चौबे और सेजेस व्याख्याता संजय कुमार पाण्डेय की सीएम हेल्पलाइन में की गई शिकायत के बाद सामने आया। शिकायत में तत्कालीन डीईओ विजय टांडे और विधि खंड प्रभारी लिपिक सुनील यादव पर युक्तियुक्तकरण और प्रधान पाठक पदोन्नति में गड़बड़ी के आरोप लगाए गए थे। शिकायत के बाद प्रभारी डीईओ अजय कौशिक ने तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की।
समिति में शासकीय हाईस्कूल बिरकोना के प्राचार्य कामेश्वर बैरागी, शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय बैमा के प्राचार्य एसके कश्यप और बिल्हा की एबीईओ दीप्ति गुप्ता को शामिल किया गया था। समिति ने जांच के बाद रिपोर्ट डीईओ कार्यालय को सौंप दी, जिसे आगे डीपीआई को भेजा गया है।
कलेक्टर की समिति के आदेश को दरकिनार कर दी मनचाही पोस्टिंग
जांच समिति के अनुसार शिक्षिका संतोषी शर्मा, वंदना लहरे और जानकी चेलके के युक्तियुक्तकरण संबंधी अभ्यावेदनों को कलेक्टर की अध्यक्षता वाली जिला युक्तियुक्तकरण समिति और संभागीय समिति पहले ही परीक्षण के बाद निरस्त कर चुकी थी। इसके बावजूद तत्कालीन डीईओ ने जिला समिति या कलेक्टर का अनुमोदन लिए बिना अपने स्तर पर अभ्यावेदनों को मान्य कर मनचाही पदस्थापना दे दी।
जांच में यह भी सामने आया कि कार्यालय रिकॉर्ड में न तो कोई नया पुनर्विचार अभ्यावेदन मिला और न ही ऐसा कोई न्यायालयीन आदेश मौजूद था, जिसके आधार पर पूर्व में निरस्त मामलों को दोबारा मान्य किया जा सके।
डीपीआई के आदेश के विपरीत दी बैकडोर पोस्टिंग
जांच रिपोर्ट में पदोन्नति के बाद पदस्थापना को लेकर भी गंभीर अनियमितता बताई गई है। पदोन्नति से असंतुष्ट हलधर साहू, रमेश साहू, शिप्रा बघेल, सूरज सोनी और ज्ञानचंद पांडे ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इसके बाद डीपीआई ने 4 सितंबर 2025 को स्पष्ट आदेश जारी कर उनके अभ्यावेदनों को अमान्य कर दिया था।
इसके बावजूद तत्कालीन डीईओ ने डीपीआई के आदेश के विपरीत बिना काउंसलिंग के संबंधित शिक्षकों को सुविधाजनक स्कूलों में पदस्थ कर दिया। जांच में यह भी पाया गया कि 27 दिसंबर 2024 की काउंसलिंग के समय संबंधित स्कूलों में पद रिक्त नहीं थे। इन पदस्थापना आदेशों से जुड़ी नोटशीट पर डीईओ के अलावा किसी अन्य शाखा प्रभारी के हस्ताक्षर या समिति की मंजूरी भी नहीं थी।
11 महीने बाद निरस्त पदोन्नति आदेश फिर किए बहाल
जांच समिति ने पदोन्नति आदेशों में भी गंभीर गड़बड़ी पकड़ी। 27 दिसंबर 2024 के पदोन्नति आदेश में स्पष्ट था कि 10 दिनों के भीतर कार्यभार ग्रहण नहीं करने पर आदेश स्वतः निरस्त माना जाएगा। दिनेश तंबोली, रमेश उईके, हरिपाल सिंह पैंकरा, दिलेश धृतलहरे और पुरुषोत्तम निखर ने निर्धारित अवधि में कार्यभार ग्रहण नहीं किया और न ही कोई स्टे लिया। लिहाजा 6 जनवरी 2025 को उनके पदोन्नति आदेश स्वतः समाप्त हो गए थे।
इसके बावजूद करीब 11 महीने बाद तत्कालीन डीईओ ने इन शिक्षकों को फिर से पदस्थापना का लाभ दे दिया। रिपोर्ट के मुताबिक 21 नवंबर 2025 को आवेदन लिया गया और महज चार दिन बाद 25 नवंबर को संशोधित आदेश जारी कर सभी को उनके गृह विकासखंड कोटा में मनचाही जगह पदस्थ कर दिया गया।
वरिष्ठों को दरकिनार कर कनिष्ठों को पदोन्नति
20 मार्च 2026 को प्रतीक्षा सूची के नाम पर पांच शिक्षकों को पदोन्नति देने के मामले में भी जांच समिति ने अनियमितता पाई है। समिति के अनुसार मूल पदोन्नति के करीब 15 महीने बाद यह प्रक्रिया की गई, जबकि डीपीसी की मंजूरी की वैधता एक वर्ष में समाप्त हो चुकी थी।
इस प्रक्रिया में वरिष्ठता क्रम की अनदेखी का आरोप भी सामने आया। वरिष्ठता सूची में ऊपर रहने वाले देवी नारायण पटेल, चमेली साहू, शत्रुहन कुमार जांगड़े और भानु केशरी को पदोन्नति नहीं दी गई, जबकि उनसे नीचे क्रमांक वाले हेमलता पटेल, ईश्वरी ध्रुव, आस्था गौरहा, फुलेश सिंह पोर्ते और टंकेश्वर जगत को पदोन्नति देकर बिना काउंसलिंग शहर के भीतर मनचाही पदस्थापना दी गई।
लिपिक के खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा क्यों नहीं?
जांच रिपोर्ट में विधि खंड के प्रभारी लिपिक सुनील यादव की भूमिका का भी उल्लेख है। बताया गया है कि पदोन्नति के संशोधित आदेशों में उनके लघु हस्ताक्षर पाए गए। हालांकि समिति ने केवल दो शिक्षकों के आदेश में उनके हस्ताक्षर पाए जाने के आधार पर लिपिक के खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा नहीं की।
जांच समिति के सदस्य कामेश्वर बैरागी ने कहा कि समिति ने उपलब्ध दस्तावेजों का परीक्षण कर निष्कर्ष दिया है। विभाग चाहे तो जांच के निष्कर्षों के आधार पर आगे भी कार्रवाई कर सकता है और पूरे मामले की विस्तृत जांच कराई जा सकती है।
अब जांच रिपोर्ट डीपीआई को भेजे जाने के बाद इस मामले में आगे क्या कार्रवाई होती है, इस पर शिक्षकों और शिक्षा विभाग की नजर है।