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GPM “जीवन सिंह राठौर कनेक्शन पर घिरा प्रशासन”: बसंतपुर जमीन कांड पार्ट-2 में अब जवाबदेही का सवाल?

पहली कड़ी के बाद अब असली मुद्दा—जवाबदेही कौन लेगा?

GPM- बसंतपुर की “बड़े झाड़ जंगल मद” जमीन को लेकर सामने आए फर्जीवाड़े के बाद अब इस पूरे मामले की दूसरी कड़ी में सबसे बड़ा सवाल प्रशासनिक जवाबदेही का है। पहली खबर में कागजी खेल, फर्जी प्रविष्टि और नामांतरण का खुलासा हो चुका है, लेकिन अब सवाल यह है कि इतने गंभीर मामले के बावजूद प्रशासन ने अब तक ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की।
कौन सी है जमीन, कैसे शुरू हुआ पूरा मामला
पेंड्रा तहसील के ग्राम बसंतपुर स्थित खसरा नंबर 1/44, रकबा 3.11 एकड़ जमीन रिकॉर्ड में “बड़े झाड़ जंगल मद” यानी शासकीय श्रेणी की बताई जा रही है। ऐसी जमीन सामान्यतः न तो निजी स्वामित्व में दी जा सकती है और न ही उसकी खरीद-बिक्री की अनुमति होती है।
इसके बावजूद इस जमीन को कागजों में निजी दिखाकर पूरा लेन-देन कर दिया गया—यहीं से विवाद की शुरुआत होती है।
विक्रेता से क्रेता तक—पूरी चेन पर सवाल
09 दिसंबर 2020 को छोगरिया (पति बक्शु) से जीवन सिंह राठौर को जमीन की बिक्री हुई। इसके बाद 21 नवंबर 2022 को जीवन सिंह राठौर ने अपनी पत्नी देववती राठौर को दान पत्र के जरिए जमीन हस्तांतरित की।
फिर 16 मार्च 2023 को देववती राठौर ने यह जमीन अजय कुमार अग्रवाल को बेच दी।
यह पूरी प्रक्रिया कागजों में वैध दिखाई गई, लेकिन जमीन की मूल प्रकृति को लेकर गंभीर सवाल बने हुए हैं।
अधिकार अभिलेख में फर्जी प्रविष्टि—पूरा खेल यहीं से शुरू
मामले की जड़ अधिकार अभिलेख (मिशल) में कथित कूट रचना है। मूल रिकॉर्ड में 1 से 99 तक प्रविष्टियां थीं, लेकिन बाद में “100 नंबर” जोड़कर नई एंट्री कर दी गई।
यह कोई सामान्य त्रुटि नहीं, बल्कि ऐसा बदलाव है जिसने जमीन की स्थिति ही बदल दी।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि राजस्व विभाग के सुरक्षित अभिलेख में यह बदलाव कैसे हुआ और किसके जरिए हुआ?
जीवन सिंह राठौर की भूमिका क्यों अहम मानी जा रही
पूरे घटनाक्रम में जीवन सिंह राठौर एक केंद्रीय कड़ी के रूप में सामने आते हैं। जमीन की खरीदी, फिर पारिवारिक दान और उसके बाद बिक्री—इन सभी चरणों में उनकी भूमिका सीधे जुड़ी हुई है।
सूत्रों के अनुसार अधिकार अभिलेख में कथित बदलाव के बाद ही यह पूरी प्रक्रिया संभव हो पाई।
नामांतरण का विवाद और प्रशासनिक फैसलों पर सवाल
शिकायत के बाद तत्कालीन तहसीलदार ने नामांतरण निरस्त कर दिया था, जिससे यह संकेत मिला कि मामले में गड़बड़ी है।
लेकिन बाद में उसी जमीन का नामांतरण फिर से कर दिया गया।
यहीं से प्रशासनिक फैसलों की पारदर्शिता पर सवाल उठने लगे हैं।
तहसीलदार अविनाश कुजूर की भूमिका भी जांच के दायरे में
नामांतरण दोबारा किए जाने में तहसीलदार अविनाश कुजूर की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं।
जब एक बार मामला निरस्त हो चुका था, तो दोबारा किस आधार पर उसे मंजूरी दी गई—इस पर अब तक स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया है।
जिला प्रशासन की चुप्पी—सबसे बड़ा सवाल
इतने गंभीर मामले में जिला प्रशासन की चुप्पी खुद एक बड़ा मुद्दा बन गई है।
शिकायत के बाद शुरुआती कार्रवाई हुई, लेकिन उसके बाद पूरे मामले में ठहराव क्यों आ गया?
क्या जांच अधूरी है या फिर मामला जानबूझकर आगे नहीं बढ़ाया जा रहा?
राजस्व तंत्र की कार्यप्रणाली पर उठते सवाल
अधिकार अभिलेख जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज में बदलाव, नामांतरण के फैसले और जमीन की खरीद-बिक्री—इन सभी प्रक्रियाओं ने मिलकर राजस्व तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
यदि सरकारी रिकॉर्ड में ही इस तरह का बदलाव संभव है, तो आम नागरिक की जमीन कितनी सुरक्षित है—यह बड़ा प्रश्न बन चुका है।
अब आगे क्या? जवाबदेही तय होना जरूरी
बसंतपुर जमीन कांड अब सिर्फ एक जमीन का मामला नहीं रहा, बल्कि यह प्रशासनिक जवाबदेही और पारदर्शिता की परीक्षा बन चुका है।
अब देखना होगा कि इस मामले में जिम्मेदारों की पहचान कर कार्रवाई की जाती है या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह समय के साथ दबा दिया जाएगा।

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