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निलंबित ASI दिनेश तिवारी का एक और बड़ा ‘खेल’ उजागर, लूट को बनाया ‘साधारण मामला’ ताकि बच सकें अपराधी

​बिलासपुर। रतनपुर थाने में पदस्थ रहते हुए निलंबित हुए एएसआई दिनेश तिवारी के कारनामों की फेहरिस्त लंबी होती जा रही है।बिलासपुर पुलिस महकमे में उस वक्त हड़कंप मच गया जब निलंबित ASI दिनेश तिवारी के कारनामों का एक और काला अध्याय सामने आया। आरोप है कि तिवारी ने खाकी की आड़ में न केवल कानून का मजाक उड़ाया, बल्कि संगीन अपराध करने वाले डकैतों को ‘सेफ पैसेज’ देने के लिए पूरी केस डायरी ही बदल डाली।अब एक ऐसा मामला सामने आया है जहाँ तिवारी ने अपनी विवेचना की शक्ति का दुरुपयोग कर संगीन डकैती के आरोपियों को न केवल कड़ी सजा से बचाया, बल्कि उनके दोषमुक्त होने का मार्ग भी प्रशस्त कर दिया।

​डकैती को बनाया साधारण लूट: न्यायिक शक्तियों के साथ खिलवाड़

​मामला न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी बिलासपुर के केस नंबर 648/2021 से जुड़ा है। यह मामला धारा 394, 341 और 34 भादवि के तहत आरोपी दीपक सिंह व अन्य के विरुद्ध था। घटना के दौरान आरोपियों ने लाठी और चाकू जैसे घातक हथियारों का इस्तेमाल किया था।

​कानूनी जानकारों और पुलिस महानिरीक्षक बिलासपुर द्वारा गठित समीक्षा समिति के अनुसार, प्रथम दृष्टया यह मामला धारा 397 भादवि (हत्या की योजना बनाकर डकैती) का था।

​सत्र न्यायालय का मामला: नियमानुसार धारा 397 के तहत मामला सत्र न्यायालय में चलना चाहिए था, जहाँ अपराधियों को आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती थी।

​मजिस्ट्रेट न्यायालय में पेशी: विवेचना अधिकारी ASI दिनेश तिवारी ने जानबूझकर इसे लूट का साधारण मामला बनाकर मजिस्ट्रेट न्यायालय में पेश किया। बता दें कि मजिस्ट्रेट न्यायालय को अधिकतम 3 वर्ष तक की सजा देने का ही अधिकार है।

​आरोपियों को बचाने के लिए रची गई ‘दोहरी रणनीति’

​समीक्षा समिति की जांच में यह स्पष्ट हुआ है कि विवेचक दिनेश तिवारी (तत्कालीन चौकी प्रभारी मल्हार) ने आरोपियों को लाभ पहुँचाने के लिए संभवतः दो स्तरों पर काम किया:

​पहचान कार्यवाही का अभाव: तिवारी ने जानबूझकर आरोपियों की ‘शिनाख्त परेड’ नहीं कराई। कानूनन, यदि अपराधी की पहचान ही पुख्ता न हो, तो उसे सजा मिलना नामुमकिन हो जाता है। इसी तकनीकी खामी का फायदा आरोपियों को मिला।

​सजा की अवधि कम करना: डकैती की धारा को लूट में बदलकर यह सुनिश्चित किया गया कि यदि अपराध साबित भी हो जाए, तब भी आरोपियों को आजीवन कारावास के बजाय अधिकतम 3 साल की ही सजा हो।

​अधूरी विवेचना और साठगांठ का परिणाम: आरोपी हुए दोषमुक्त

​विवेचना में इन जानबूझकर छोड़ी गई कमियों के कारण न्यायालय ने आरोपी दीपक सिंह व अन्य को वर्ष 2025 मे दोषमुक्त कर दिया है। आईजी समीक्षा समिति की रिपोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि आरोपियों को बड़ी सजा से बचाने की एक सोची-समझी साजिश थी।

​यह मामला उन सभी पीड़ितों के लिए एक बड़ा झटका है जो इंसाफ की उम्मीद में पुलिस के पास जाते हैं। जब रक्षक ही भक्षक बनकर आरोपियों की केस फाइल तैयार करने लगे, तो न्याय मिलना असंभव हो जाता है। एसएसपी के निर्देश पर अब इस ‘दागी’ निलंबित ASI दिनेश तिवारी के पुराने सभी मामलों की फाइलें खोली जा रही है, जिससे कई और बड़े खुलासे होने की उम्मीद है.​फिलहाल, इस मामले की विस्तृत जांच पुलिस अधीक्षक कार्यालय में चल रही है, जिसके बाद विवादित एएसआई की मुश्किलें और बढ़ना तय है।

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