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एक लेन नहीं, अब तीन लेन में करना होगा पौधारोपण

बिलासपुर- एक लेन नहीं, अब तीन लेन में करना होगा पौधारोपण। प्रजाति विशेष का ध्यान इसलिए रखना होगा क्योंकि हीट वेव के दिन दोगुने हो चुके हैं।

शहरी संरचना में बदलाव और विकास के पर्याय माने जा रहे औद्योगिकीकरण की कीमत चुका रहा है छत्तीसगढ़ बढ़ते तापमान और बढ़ चुके हीट वेव के दिनों के रूप में। हद तो तब, जब रात में भी लू की आशंका बन रही है।


इसलिए तीन लेन में रोपण

तेज धूप और हीट वेव से बचाव के हर उपाय अब नाकाफी साबित हो रहें हैं। इसलिए अब प्रकृति आधारित उपायों पर ध्यान देने की जरूरत महसूस की जा रही है। इसके तहत अब तीन लेन में पौधरोपण को स्थाई समाधान के रूप में देखा जा रहा है। भूमि की उपलब्धता वाले मार्ग और क्षेत्र में इस योजना को आकार दिया जा सकता है।


औद्योगिक हरियाली

लगभग हर जिले में अब औद्योगिक इकाइयां पर संचालन में आ गईं हैं। जरूरत के मुताबिक खनन क्षेत्र भी विस्तार ले रहा है। समानांतर में जंगलों का क्षेत्रफल सिमट रहा है। ऐसे में यह क्षेत्र भी अब हीट वेव की चपेट में आ चुके हैं। इसलिए प्रभावित क्षेत्र की 5 से 25 किलोमीटर की परिधि में ग्रीन बेल्ट प्लान को प्रभावी किया जाना जरूरी माना जा रहा है।


बढ़ रहे हीट वेव के दिन

आमतौर पर 10 से 15 दिन तक ही लू चलती है। सामान्य थी यह अवधि लेकिन कटते जंगल, बढ़ते उद्योग और शहरी संरचनाओं के बाद अब इसमें 10 दिनों की वृद्धि देखी जा रही है। बचाव के कई उपायों के असफल होने की स्थिति को देखते हुए अब फिर से प्रकृति आधारित उपायों पर प्रयास किए जाने की जरूरत पर जोर दे रहे हैं वानिकी वैज्ञानिक।

वर्जन
हीट वेव स्थाई पर्यावरणीय चुनौती

वर्तमान परिदृश्य में हीट वेव केवल मौसमी समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह एक स्थायी पर्यावरणीय चुनौती बन चुकी है। इसके प्रभावी नियंत्रण के लिए तीन-लेन आधारित बहु-स्तरीय पौधरोपण मॉडल अपनाना अत्यंत आवश्यक है। इसमें ऊँचे, मध्यम और झाड़ी स्तर के पौधों का वैज्ञानिक संयोजन किया जाना चाहिए, जिससे अधिकतम छाया, तापमान नियंत्रण और सूक्ष्म जलवायु का निर्माण हो सके। औद्योगिक एवं खनन क्षेत्रों के आसपास सघन ग्रीन बेल्ट का विकास अनिवार्य किया जाना चाहिए, जिसमें स्थानीय एवं जलवायु सहनशील प्रजातियों को प्राथमिकता दी जाए। यदि इन उपायों को योजनाबद्ध तरीके से लागू किया जाए, तो बढ़ते तापमान और हीट वेव के प्रभाव को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर

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