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तपिश ने छिनी फूलों की रंगत, उत्पादन और गुणवत्ता दोनों प्रभावित

– जलवायु परिवर्तन की मार फल,फूल और बीजों पर भी

बिलासपुर- संख्या, आकार, रंग, सुगंध और बाजार गुणवत्ता में जोरदार गिरावट इसलिए क्योंकि पुष्पन के दौरान तापमान सामान्य से 2 से 4 डिग्री सेल्सियस ज्यादा था। सक्रियता मधुमक्खियां, तितलियां, भंवरे और पतंगे जैसे मुख्य परागणकर्ताओं की भी कमजोर रही।

जलवायु परिवर्तन के दौर में अनियमित मानसून, लंबे शुष्क अंतराल, कम समय में अधिक बारिश, तापमान में बढ़ोतरी, गर्म हवाएं और सामान्य से अधिक आर्द्रता का असर अब फूल और बीज फलों पर देखा जा रहा है। स्थितियां और परिवर्तन पर नजर रख रहे वैज्ञानिकों ने ऐसी बागवानी प्रणालियों को विकसित करने की जरूरत बताई है, जो अधिक तापमान में भी सहनशील हो, कम पानी में बेहतर उत्पादन के साथ ही परागणकर्ताओं के अनुकूल भी हों।


संवेदनशील यह अवस्था

कलियों का बनना, फूलों का खिलना, परागण, निषेचन और प्रारंभिक फलों का बनना किसी भी पौधे के लिए बेहद संवेदनशील मानी जाती है। इन अवस्थाओं में न केवल तापमान सामान्य से ज्यादा रहा बल्कि परागणकर्ताओं ने भी साथ छोड़ दिया। इससे यह सभी अवस्थाएं अपने-अपने स्तर पर प्रभावित होती रहीं। इसे फूलों का आकार छोटा, रंग और सुगंध कमजोर होने, जल्दी मुरझाने के साथ, बाजार गुणवत्ता में गिरावट के रूप में देखा गया।


सक्रियता घटी परागणकर्ताओं की

जलवायु परिवर्तन का प्रभाव केवल पौधों को ही प्रभावित नहीं कर रहा है बल्कि परागण करने वाले कीटों पर भी देखा जा रहा है। मधुमक्खी, तितली, भंवरे, पतंगे और कुछ पक्षियों जैसे मुख्य परागणकर्ताओं की सक्रियता में व्यापक गिरावट इसलिए देखी जा रही है क्योंकि तापमान न केवल सहनसीमा से ज्यादा था बल्कि सामान्य से चार डिग्री सेल्सियस अधिक था। सक्रियता कमजोर होने की वजह से अपना काम बखूबी से नहीं कर पाए।


प्रभावित हो रहीं यह फसलें

फूलों में गुलाब, गेंदा, चमेली, सूरजमुखी, फलों में आम, लीची, अमरुद, जामुन, नींबू, कटहल और करौंदा जैसी फसलें खतरे की जद में आ चुकीं हैं। वानिकी प्रजातियों में चिरौंजी, महुआ, करंज, अर्जुन, पलाश, शीशम और सागौन में फूल और बीज उत्पादन कम हो सकता है। असर सीधे-सीधे प्राकृतिक पुनर्जनन पर पड़ना तय माना जा रहा है। इसलिए जलवायु सहिष्णु फूल, बागवानी, उद्यानिकी एवं कृषि वानिकी प्रणालियां विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है।

वर्जन
जलवायु परिवर्तन से परागण संकट गहरा रहा है

फूलों की संख्या, गुणवत्ता और फल बनने की प्रक्रिया पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। अधिक तापमान और परागणकर्ताओं की घटती सक्रियता उत्पादन तथा जैव विविधता दोनों के लिए चिंता का विषय है। यदि यही प्रवृत्ति जारी रही तो बागवानी फसलों के साथ-साथ चिरौंजी, महुआ, करंज, पलाश, अर्जुन और सागौन जैसी महत्वपूर्ण वानिकी प्रजातियों के प्राकृतिक पुनर्जनन पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। अब आवश्यकता ऐसी जलवायु-सहिष्णु कृषि, उद्यानिकी एवं कृषि वानिकी प्रणालियों को बढ़ावा देने की है, जो परागणकर्ताओं के अनुकूल हों, कम पानी में बेहतर उत्पादन दें तथा बदलती जलवायु के प्रति अधिक सहनशील हों।

अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर

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