छत्तीसगढ़ में बढ़ा आकाशीय बिजली का खतरा, वैज्ञानिक भी हैरान

– बस्तर सहित 10 जिले सर्वाधिक संवेदनशील
बिलासपुर- बढ़ता तापमान, लंबे शुष्क दिवस और कम समय में ज्यादा बारिश ही नहीं, अब आकाशीय बिजली की बढ़ती आवृत्ति आश्चर्य में डाल रही है मौसम और कृषि वैज्ञानिकों को। प्रभावित दस जिलों में बस्तर जिला को सबसे संवेदनशील जिला माना जा रहा है।
जलवायु परिवर्तन के दौर में बस्तर के पठार और उत्तरी छत्तीसगढ़ की पहाड़ियां आसान लक्ष्य बनी हुई हैं आकाशीय बिजली का। बड़ा सहयोग भू-आकृति के साथ घना वनावरण और मानसूनी परिवर्तन का भी मिल रहा है। इसके अलावा मानवीय गतिविधियों को भी जिम्मेदार माना जा रहा है।जिसकी वजह से इस प्राकृतिक आपदा से मौतों की संख्या भी बढ़ रही है।

इसलिए संवेदनशील
बस्तर के साथ कोंडागांव, दंतेवाड़ा, बीजापुर, नारायणपुर, कांकेर और सुकमा इसलिए सर्वाधिक संवेदनशील जिले हैं क्योंकि इन जिलों की भू-आकृति और घना वनावरण के साथ मानसूनी परिस्थितियां आकाशीय बिजली बनाने के लिए अत्यंत अनुकूल हैं जबकि सरगुजा, जशपुर तथा कोरिया जिले की पहाड़ियां जलवायु परिवर्तन के दौर में आकाशीय बिजली की आवृत्ति बढ़ाने में पूरी मदद कर रहीं हैं।
यह मौसमीय बदलाव
बस्तर का पठार और उत्तरी छत्तीसगढ़ के पहाड़ी क्षेत्र की भूमि तेजी से गर्म होने लगी है। प्रतिक्रिया स्वरूप गर्म हवा ऊपर उठने पर ठंडी हवा से मिलती है। इससे तीव्र संवहन उत्पन्न होता है। नया बदलाव यह कि तापमान 42 से 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जा रहा है। यह तापमान अधिक वाष्पीकरण, अधिक जलवाष्प और अधिक संवहन जैसी स्थिति बना रहा है। यही वजह है कि अप्रैल से जून के बीच प्री- मानसून आंधी और आकाशीय बिजली गिरने की आवृत्ति में बढ़ोतरी देखी जा रही है।
हैरान कर रही तीव्रता और गति
मानसूनी बदलाव के बीच आकाशीय बिजली की गति और तीव्रता भी मौसम वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा रही है। प्रारंभिक अनुसंधान में आकाशीय बिजली का तापमान 30000 डिग्री सेल्सियस के होने की जानकारी सामने आई है जबकि वोल्टेज 10 करोड़ वोल्ट के होने का अनुमान है। 1 लाख किलोमीटर, प्रति सेकंड जैसी गति को भी आश्चर्यजनक गति माना जा रहा है। यही वजह है कि ऐसी स्थिति में अलर्ट की एडवाइजरी जारी की जा रही है।
वर्जन
बदलते मौसम का नया खतरा – आकाशीय बिजली
जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ता सतही तापमान, अधिक नमी और तीव्र संवहन अब आकाशीय बिजली की घटनाओं को अधिक बार और अधिक तीव्र बना रहे हैं। बस्तर का पठारी क्षेत्र तथा उत्तरी छत्तीसगढ़ की पहाड़ियां अपनी भू-आकृति और घने वनावरण के कारण स्वाभाविक रूप से अधिक संवेदनशील हैं। ऐसे में समय पर मौसम अलर्ट का पालन, खुले स्थानों और ऊंचे वृक्षों से दूरी तथा वैज्ञानिक जन-जागरूकता ही जनहानि कम करने का सबसे प्रभावी उपाय है।
अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर