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डॉक्टर,बाबूओ और छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई हुई लेकिन कई लोगो को बचा रही पुलिस,सर्पदंश में मर्ग कायम करने के बाद जांच में शामिल होते है पुलिस से लेकर कई अधिकारी

लिपिक संघ बोला,जांच मे शामिल दोषियों पर हो कार्रवाई

राजस्व प्रशासनिक संघ बोला,जो दोषी हो उसी पर हो कार्रवाई,राजस्व अधिकारियों को आपराधिक मामले में शामिल न करे

बिलासपुर । सर्पदंश मुआवजा घोटाले को लेकर सुर्खिया बनी हुई है।इसमें लिपिक संघ ने एक तरफा कार्रवाई करने का जमकर विरोध किया है।यही नहीं राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी भी एकजुट होकर कार्रवाई का विरोध करने लगे है।
आलम ये हो चुका है कि सिर्फ लिपिक और बाबूओ को फंसाकर कार्रवाई हो रही है जबकि इसमें दोषियों पर कार्रवाई नहीं की जा रही है।
हालाकि इसमें अब तक एक डॉक्टर गिरफ्तार होकर जेल जा चुकी है ।लेकिन अंतिम प्रतिवेदन रिपोर्ट देने वाले पुलिस अधिकारी पर अब तक कार्रवाई नहीं हुई है।जो मर्ग कायम कर जांच करते है।जिसमें सिर्फ डॉक्टर,पटवारी,तहसीलदार,एसडीएम ही नहीं बल्कि पुलिस भी शामिल है।जिनकी जांच को अहम माना जाता है।
जबकि पुलिस की जांच में परिजनों और आसपास के लोगो का बयान भी दर्ज होता है।इसके बाद भी इस मामले के सिर्फ राजस्व अधिकारियों को बलि का बकरा बनाना समझ से परे है।

दरअसल सूत्र बता रहे है कि जब भी किसी को सांप काटता है तो वह इलाज के लिए अस्पताल जाता है और जब उसकी मौत होती है तो उसका मर्ग कायम कर संबंधित थाना के विवेचना अधिकारी जांच करते है।जांच में पटवारी और मृतक के परिजन भी शामिल रहते है।
जिसका रिपोर्ट तैयार होता है और उसके बाद थाना प्रभारी के माध्यम से प्रतिवेदन रिपोर्ट तैयार होता है इस बीच डॉक्टर द्वारा बनाया गया पीएम रिपोर्ट और बिसरा रिपोर्ट भी रहता है ।इसके बाद पूरे कागज को सीएसपी,एसडीओपी के पास से होते हुए तहसीलदार के पास जाता है जिसमें सुनवाई होती है और उसके बाद कागज को देखने के बाद एसडीएम के पास भेजा जाता है एसडीएम के पास से सीधे फाइल अपर कलेक्टर के पास जाता है।उसके बाद पूरी तरह से जांच होने के बाद अपर कलेक्टर संबंधित परिजनों के खाते मे 4 लाख रुपए डालने का ऑर्डर पास करते है।तब कही जाकर मृतक के परिजनों के खाते में पैसा आता है।तब मृतक के परिजनों को मुआवजा राशि का
लाभ मिलता है।


जांच में शामिल होते है पटवारी,पुलिस और डॉक्टर

सूत्र बता रहे है कि इस सर्पदंश के मामले में पुलिस,डॉक्टर और पटवारी,तहसीलदार और एसडीएम भी शामिल होते है।चूंकि नीचे स्तर से जांच शुरू होती है और उसके बाद ऊपर अधिकारी तक जाता है।इस बीच तहसीलदार,एसडीएम अपर कलेक्टर और बाबू तक भी शामिल रहते है।जिनके पास फाइल रहता है।लेकिन मुख्य भूमिका इसमें डॉक्टर और पुलिस के बीच का है जिसमें रिपोर्ट को डॉक्टर तैयार करते है और बिसरा रिपोर्ट और अंतिम प्रतिवेदन को पुलिस तैयार करता है।इसके बाद भी पुलिस पर कार्रवाई नहीं होना संदेह से परे है।


जानिए सर्पदंश मे कौन कौन होता है शामिल

राजस्व नियमों के अनुसार सर्पदंश से मृत्यु पर मुआवजा स्वीकृत करने की प्रक्रिया कई स्तरों से गुजरती है।सबसे पहले पुलिस मर्ग दर्ज कर जांच करती है। पंचनामा और पोस्टमार्टम कराया जाता है। आवश्यक होने पर बिसरा परीक्षण होता है। इसके बाद आवेदन तहसील कार्यालय पहुंचता है। पटवारी जांच प्रतिवेदन देता है। तहसीलदार परीक्षण कर एसडीएम को भेजता है। एसडीएम अनुशंसा करता है और सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति के बाद ही मुआवजा राशि जारी होती है।

1 सर्पदंश सिम्स अस्पताल में इलाज
2 सर्पदंश से हुए मौत के बाद मर्ग कायम पुलिस द्वारा
3 डॉक्टर बनाते है पीएम रिपोर्ट
4 मर्ग कायम कर पुलिस अधिकारी करते है मौके पर जाकर जांच,परिजनों का होता है बयान,फिर देते है अंतिम प्रतिवेदन रिपोर्ट
5 पटवारी देते है प्रतिवेदन रिपोर्ट
6 थाना प्रभारी के पास से जाता है सक्षम अधिकारी के पास
7 थाना से जाता है संबंधित तहसीलदार के पास
8 तहसीलदार के पास से जांच होकर गुजरता है एसडीएम के पास
9 एसडीएम के पास से जांच होकर जाता है अपर कलेक्टर के पास
10 अपर कलेक्टर की अनुशंसा से क्षेत्र के संबंधित अधिकारी देते है मुआवजा राशि
11 इस पूरे खेल में दलाल करते है पैसों के बंदरबांट करने का काम,जिसमें सेटिंग और दलाली करने का काम होता है।


राजस्व विभाग के बाद अब पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की भूमिका पर भी सवाल

अब तक सबसे अधिक सवाल राजस्व विभाग की भूमिका को लेकर उठते रहे हैं, लेकिन जांच आगे बढ़ने के साथ पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की प्रक्रिया भी चर्चा के केंद्र में आ गई है।
मुआवजा प्रकरण का आधार बनने वाली मर्ग रिपोर्ट और पोस्टमार्टम रिपोर्ट पुलिस और स्वास्थ्य विभाग से ही तैयार होती हैं। ऐसे में यह भी देखा जा रहा है कि संबंधित दस्तावेज किस स्तर पर तैयार हुए, उनका सत्यापन कैसे हुआ और अंतिम रिपोर्ट किन परिस्थितियों में आगे बढ़ी।इसमें डॉ. प्रियंका सोनी से जुड़ी कथित फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट का मामला सामने आने के बाद यह पहलू और संवेदनशील हो गया है।


सिम्स और तहसील कार्यालय के कई संदिग्ध रडार पर

जांच एजेंसियां सिम्स अस्पताल के मॉर्च्युरी से जुड़े कर्मचारियों और तहसील कार्यालय की मुआवजा शाखा में पदस्थ रहे कर्मचारियों की भूमिका की भी गहन पड़ताल कर रही हैं।पुलिस का मानना है कि यदि दस्तावेजी और डिजिटल साक्ष्य मिले तो आने वाले दिनों में और लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।


तहसीलदार और पटवारियों से पूछताछ फिलहाल टली

जिन तहसीलदारों और पटवारियों की भूमिका मुआवजा स्वीकृति प्रक्रिया में रही, उनसे प्रस्तावित पूछताछ फिलहाल टल गई है। राजस्व विभाग और पुलिस अधिकारियों की अलग-अलग बैठकों के चलते पूछताछ आगे नहीं बढ़ सकी।

सर्पदंश मुआवजा केस में अब ‘बड़ी मछलियों’ को पकड़ने डाला गया जाल

जांच अधिकारियों को निर्देश दिए गए कि कथित फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट, कूटरचित शासकीय सील, बैंक खातों के ट्रांजेक्शन, डिजिटल डिवाइसों की एफएसएल रिपोर्ट और अन्य दस्तावेजी साक्ष्यों को वैज्ञानिक तरीके से जोड़कर अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया जाए। सभी थानों से जुड़े प्रकरणों के रिकॉर्ड भी आईजी कार्यालय स्तर पर खंगाले जा रहे हैं।


जांच केवल फर्जी दस्तावेजों तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया की भूमिका पर केंद्रित

अब जांच का फोकस केवल गिरफ्तार आरोपियो तक सीमित नहीं है। पुलिस यह भी पता लगाने में जुटी है कि मुआवजा राशि का वितरण किस प्रकार हुआ, किसे कितना कथित कमीशन मिला और नेटवर्क की वास्तविक कमान किसके हाथ में थी।
सिम्स से तहसील तक कथित नेटवर्क कैसे करता था काम
जांच एजेंसियों के अनुसार पूरा कथित तंत्र बेहद सुनियोजित ढंग से संचालित होता था।जैसे ही कोई शव पोस्टमार्टम के लिए सिम्स पहुंचता, उसकी सूचना कथित रूप से नेटवर्क से जुड़े लोगों तक पहुंच जाती थी। इसके बाद मृतक के परिजनों को शासन से मिलने वाले चार लाख रुपये के प्राकृतिक आपदा राहत मुआवजे का हवाला देकर कथित तौर पर सर्पदंश का मामला बनाने के लिए तैयार किया जाता था।
इसके बाद कथित रूप से पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बदलाव, मर्ग इंटीमेशन में हेरफेर, पटवारी प्रतिवेदन, राजस्व अभिलेख, तहसील स्तर की जांच, एसडीएम कार्यालय की प्रक्रिया और अंततः मुआवजा स्वीकृति तक पूरी फाइल आगे बढ़ती थी। यही वजह है कि अब जांच केवल फर्जी दस्तावेजों तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया की भूमिका पर केंद्रित हो गई है।


जांच में फर्जी हस्ताक्षर,नकली सील, कूटरचित दस्तावेज या झूठे शपथपत्र की निष्पक्ष करे जांच

लिपिक संघ का कहना है कि यदि जांच में फर्जी हस्ताक्षर, नकली सील, कूटरचित दस्तावेज या झूठे शपथपत्र सामने आए हैं तो पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यह पता लगाया जाना चाहिए कि फर्जी दस्तावेज किसने तैयार किए, किस स्तर पर उनका सत्यापन हुआ और किन अधिकारियों के आदेश से लाभ स्वीकृत हुआ। केवल रिकॉर्ड प्रस्तुत करने वाले कर्मचारियों को जेल भेज देना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता।
ज्ञापन में पुलिस से यह मांग भी की गई है कि यदि न्यायालय को मिथ्या तथ्यों और कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर गुमराह कर आदेश प्राप्त किए गए हैं तो भारतीय न्याय संहिता के तहत हर पहलू की भी गंभीर जांच की जाए और वास्तविक षड्यंत्रकारियों एवं दोषियों तक कार्रवाई पहुंचाई जाए।


कार्रवाई का केंद्र वास्तविक दोषी व्यक्ति हों,न कि उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर वैधानिक आदेश पारित करने वाले तहसील के अधिकारी

राज्य प्रशासनिक संघ के अपर कलेक्टर शिवकुमार बनर्जी ने बताया कि प्राकृतिक आपदा राहत, विशेषकर सर्पदंश मृत्यु के आर्थिक सहायता प्रकरणों में राजस्व न्यायालयों के पीठासीन अधिकारियों को अनावश्यक रूप से आपराधिक जांच में शामिल किए जाने पर चिंता व्यक्त की गई।
संघ ने कहा कि यदि किसी प्रकरण में मिथ्या शपथपत्र, जाली हस्ताक्षर, फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट, कूटरचित दस्तावेज अथवा अन्य असत्य अभिलेखों के आधार पर न्यायालय से आदेश प्राप्त किए गए हैं, तो कार्रवाई का केंद्र वास्तविक दोषी व्यक्ति हों, न कि उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर वैधानिक आदेश पारित करने वाले राजस्व न्यायालय के अधिकारी।


अब तक कई गिरफ्तारियां,जांच का दायरा लगातार बढ़ता गया

इस बहुचर्चित मामले में अब तक डॉ. प्रियंका सोनी, महेंद्र मनहर, गोविंद विश्वकर्मा, हीराप्रसाद खांडेकर, कुश कुमार गुप्ता, नरेंद्र कौशिक, हरिशंकर राठौर, गरीबराम बिंझवार, रामकुमार पाटनवार, रामेश्वर भास्कर सहित कई आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। पुलिस का दावा है कि पूरा कथित नेटवर्क संगठित तरीके से कार्य कर रहा था और विभिन्न स्तरों पर उसकी भूमिका की अलग-अलग जांच की जा रही है।

एसएसपी बोले,
सर्पदंश मामले की जांच जारी,दोषियों पर होगी कार्रवाई

जिले के एसएसपी रजनेश सिंह का कहना है कि इस मामले में जांच जारी है और इसके लिए टीम का गठन किया गया है।जो हर पहलू की जांच कर रही है,प्राथमिक आधार पर दोषियों पर कार्रवाई करके जेल भेजा गया है।इसमें और जो भी लोग शामिल होंगे उनके ऊपर कार्रवाई करके जेल भेजा जायेगा।


जांच जारी है जांच के बाद कुछ कहा जा सकता है

जिले के कलेक्टर संजय अग्रवाल का कहना है कि मामले की जांच जारी है।उसके बाद कुछ कहा जा सकता है।दोषियों पर जरूर कार्रवाई होगी।इसके लिए जांच बारीकी से किया जा रहा है।

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