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आरोप प्रमाणित, जांच संस्थित… फिर भी 237 दिन बाद कार्रवाई का इंतजार!

पत्थलगांव के प्रभारी बीईओ प्रकरण में गवाहों के बयान के बाद भी जांच अधूरी, पद पर बने रहने से उठे सवाल

स्टेशनरी भुगतान से लेकर जांच की धीमी रफ्तार तक—25 अगस्त की संयुक्त बैठक से पहले शिक्षा विभाग के सामने गंभीर प्रश्न

पत्थलगांव। विकासखंड पत्थलगांव के प्रभारी विकासखंड शिक्षा अधिकारी वेदानंद आर्य से संबंधित मामला अब केवल स्टेशनरी सामग्री और राशि भुगतान की शिकायत तक सीमित नहीं रह गया है। जिला स्तर की जांच के बाद संभाग आयुक्त कार्यालय द्वारा विभागीय जांच संस्थित किए जाने के बावजूद प्रकरण में कार्रवाई की गति और संबंधित अधिकारी के प्रभारी पद पर बने रहने को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि दिसंबर 2025 में ही जांच प्रक्रिया के दौरान संबंधित अधिकारियों, कर्मचारियों एवं अन्य व्यक्तियों के बयान दर्ज किए जाने के बाद भी 23 अगस्त 2026 तक जांच के अंतिम निष्कर्ष और कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है। 29 दिसंबर 2025 से 23 अगस्त 2026 तक कुल 237 दिन बीत चुके हैं। उपलब्ध जांच अभिलेखों में 28 एवं 29 दिसंबर 2025 को विभिन्न गवाहों के बयान दर्ज किए जाने का उल्लेख है।

जिला जांच के बाद आयुक्त ने भी संस्थित की विभागीय जांच

मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आयुक्त, सरगुजा संभाग के 10 जुलाई 2026 के आदेश में जिला शिक्षा अधिकारी, जशपुर के जांच प्रतिवेदन के आधार पर शिकायत प्रमाणित होना प्रतिवेदित किया गया है। इसी आधार पर संबंधित अधिकारी के विरुद्ध विभागीय जांच संस्थित की गई। आदेश में संबंधित कृत्य को छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1965 के नियम 3 के विपरीत बताया गया है।

आरोप-पत्र में प्राथमिक विद्यालयों के लिए ₹5,000 तथा माध्यमिक विद्यालयों के लिए ₹10,000 की सामग्री के बिल का उल्लेख है। एक संकुल के पांच विद्यालयों से ₹5,000 प्रति विद्यालय के हिसाब से कुल ₹25,000 दिए जाने का विवरण भी दर्ज है।

28 साक्षी, बयान भी दर्ज—फिर जांच में इतना विलंब क्यों?

विभागीय जांच के लिए तैयार सूची में कुल 28 अभियोजन साक्षियों को शामिल किया गया है। इनमें संकुल शैक्षिक समन्वयक, प्रधान पाठक और विभागीय कर्मचारी शामिल हैं।

ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठ रहा है कि जब जांच प्रक्रिया में दिसंबर 2025 में ही अनेक संबंधित लोगों के बयान दर्ज किए जा चुके थे, तो इसके बाद भी प्रकरण को अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने में इतनी लंबी अवधि क्यों लग रही है?

जांच में देरी का सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जिस अधिकारी के विरुद्ध विभागीय जांच चल रही है, वह अभी भी प्रभारी पद पर कार्यरत है।

जांच के बीच सामने आए नए लिखित बयानों ने भी बढ़ाई गंभीरता

इधर विभागीय स्तर पर सामने आए कुछ लिखित कथनों को लेकर भी चर्चा है। बताया जा रहा है कि कुछ संकुल शैक्षिक समन्वयकों की ओर से बाद में ऐसे लिखित कथन प्रस्तुत किए गए हैं, जिनमें संबंधित अधिकारी के विरुद्ध राशि वसूली के आरोपों से अलग स्थिति बताई गई है।

यदि किसी मामले में पहले जांच के दौरान दर्ज बयान और बाद में प्रस्तुत लिखित कथनों में महत्वपूर्ण अंतर सामने आता है, तो जांच की निष्पक्षता की दृष्टि से यह देखना आवश्यक हो जाता है कि बाद के कथन किन परिस्थितियों में और किस प्रक्रिया के तहत दिए गए।

इसका समाधान किसी पक्ष को दोषी मान लेने में नहीं, बल्कि सभी संबंधित समन्वयकों के स्वतंत्र बयान दर्ज कराने, पूर्व और बाद के बयानों का तुलनात्मक परीक्षण करने तथा भुगतान एवं सामग्री वितरण के दस्तावेजों का मिलान करने में है।

क्यूआर कोड, बिल-वाउचर और भुगतान की हो स्वतंत्र जांच

पूरे मामले में वास्तविक स्थिति सामने लाने के लिए विद्यालयवार सामग्री वितरण, संबंधित बिल-वाउचर, केसबुक प्रविष्टियां तथा क्यूआर कोड के माध्यम से किए गए भुगतान का सत्यापन महत्वपूर्ण होगा।

यदि दस्तावेजी रिकॉर्ड और मौखिक बयानों का मिलान किया जाए तो यह स्पष्ट हो सकता है कि सामग्री वास्तव में किन विद्यालयों को मिली, उसका भुगतान किसने किया और राशि किस खाते में गई।

अटैचमेंट समाप्ति के बाद भी प्रभारी व्यवस्था पर प्रश्न

मामले का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू संबंधित अधिकारी की वर्तमान प्रशासनिक स्थिति है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार पूर्व में उन्हें बीईओ के कार्य संपादन का दायित्व दिया गया था और बाद में अटैचमेंट समाप्त किए जाने की स्थिति बनी। इसके बावजूद उनके प्रभारी पद पर बने रहने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

ऐसे में शिक्षा विभाग के सामने यह स्पष्ट करना आवश्यक हो जाता है कि वर्तमान में संबंधित अधिकारी के प्रभारी पद पर बने रहने का प्रशासनिक आधार क्या है और विभागीय जांच लंबित रहने के दौरान इस व्यवस्था की समीक्षा क्यों नहीं की गई।

237 दिन की देरी अब सबसे बड़ा सवाल

29 दिसंबर 2025 से 23 अगस्त 2026 तक 237 दिन बीत चुके हैं। यदि इस अवधि में जांच के महत्वपूर्ण बयान पहले ही दर्ज किए जा चुके थे, तो अब प्रकरण को अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचाने में और कितना समय लगेगा—यह सवाल अब केवल स्थानीय स्तर का नहीं रह गया है।

शिक्षा विभाग में जवाबदेही, पारदर्शिता और समयबद्ध कार्रवाई की अपेक्षा के बीच यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विभागीय जांच लंबित रहने के दौरान संबंधित अधिकारी प्रशासनिक जिम्मेदारी संभाल रहा है।

25 अगस्त की संयुक्त बैठक में उठ सकता है मामला

25 अगस्त को शिक्षा मंत्री की मौजूदगी में बीईओ, डीईओ और संयुक्त संचालक स्तर के अधिकारियों की संयुक्त बैठक प्रस्तावित है। ऐसे में पत्थलगांव का यह प्रकरण शिक्षा विभाग की प्रशासनिक कार्यप्रणाली के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

बैठक से पहले अब शिक्षा विभाग के सामने सीधे सवाल हैं—

क्या 237 दिन से लंबित जांच को अब समयबद्ध रूप से पूरा किया जाएगा?

दिसंबर 2025 में दर्ज बयानों के बाद जांच आगे क्यों नहीं बढ़ी?

विभागीय जांच लंबित रहने के दौरान संबंधित अधिकारी को प्रभारी पद पर बनाए रखने का आधार क्या है?

क्या बाद में सामने आए कथनों और पूर्व जांच में दर्ज बयानों का स्वतंत्र सत्यापन होगा?

और सबसे महत्वपूर्ण—

यदि जांच में आरोप प्रमाणित पाए गए हैं, तो अंतिम प्रशासनिक कार्रवाई कब होगी?

अब निगाहें शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन की अगली कार्रवाई पर हैं। क्योंकि मामला केवल एक अधिकारी के विरुद्ध आरोपों का नहीं, बल्कि विभागीय जांच की समयबद्धता, साक्षियों की स्वतंत्रता और शासन के आदेशों के प्रभावी अनुपालन का भी बन चुका है।

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