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अब धान की बुवाई सीड ड्रिल, ड्रम सीडर या प्रसारण विधि से

होगी बचत श्रम, समय और सिंचाई पानी की

बिलासपुर। अब पारंपरिक धान उत्पादन प्रणाली से आगे बढ़ने का समय है। किसानों को डीआरएस  विधि अपनानी चाहिए। इस तकनीक में लगभग 20 प्रतिशत कम सिंचाई जल की आवश्यकता होती है तथा फसल 7 से 10 दिन पहले तैयार हो जाती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह तकनीक जलवायु परिवर्तन के अनुकूल मानी जा रही है।

दरअसल मानसून में विलंब, लंबे शुष्क अंतराल तथा कम समय में अत्यधिक वर्षा जैसी परिस्थितियों से जूझ रहे किसानों के लिए डीआरएस एक प्रभावी विकल्प बनकर उभरी है। इस विधि से धान की बोनी करने पर सिंचाई जल की बचत होती है, उत्पादन में स्थिरता बनी रहती है तथा मौसम की अनिश्चितताओं का प्रभाव अपेक्षाकृत कम पड़ता है। वर्तमान जलवायु परिवर्तन के दौर में यह तकनीक किसानों के लिए अधिक उपयोगी और टिकाऊ साबित हो रही है।

डीआरएस  में धान की बुवाई सीड ड्रिल, ड्रम सीडर अथवा प्रसारण विधि से सीधे खेत में की जाती है। इस तकनीक में न तो नर्सरी तैयार करनी पड़ती है और न ही पौधों की रोपाई करनी होती है। बुवाई के समय बीज समान एवं उचित मात्रा में खेत में वितरित हो जाते हैं, जिससे पौधों का विकास बेहतर होता है। श्रम, समय और लागत में कमी आने के साथ-साथ यह तकनीक जलवायु परिवर्तन की परिस्थितियों में भी प्रभावी सिद्ध हो रही है।

*डीआरएस विधि के प्रमुख लाभ*

अनुसंधानों से पता चला है कि डीआरएस तकनीक अपनाने पर लगभग 20 प्रतिशत सिंचाई जल की बचत होती है। पारंपरिक रोपाई विधि की तुलना में फसल 7 से 10 दिन पहले पककर तैयार हो जाती है। इसके अलावा उत्पादन में स्थिरता बनी रहती है तथा खेत की भौतिक संरचना भी बेहतर बनी रहती है, जिसका लाभ अगली फसल को भी मिलता है। श्रम एवं उत्पादन लागत में कमी इस तकनीक का एक अतिरिक्त लाभ है।

*छत्तीसगढ़ के इन जिलों के लिए वरदान*

छत्तीसगढ़ में लगभग 80 प्रतिशत कृषि वर्षा आधारित है। ऐसे में डीआरएस तकनीक पूरे प्रदेश के लिए उपयोगी मानी जा रही है। विशेष रूप से बिलासपुर, रायपुर, दुर्ग, धमतरी, राजनांदगांव, महासमुंद तथा बलौदा बाजार जैसे जिलों में यह तकनीक अधिक प्रभावी सिद्ध हो सकती है, क्योंकि इन क्षेत्रों की जलवायु, भूमि एवं धान उत्पादन की परिस्थितियां डीआरएस अपनाने के लिए अनुकूल हैं।

वर्जन
जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। कभी वर्षा में विलंब, कभी लंबे शुष्क अंतराल और कभी अल्प अवधि में अत्यधिक वर्षा जैसी परिस्थितियां धान उत्पादन के लिए चुनौती बन रही हैं। ऐसे समय में डायरेक्ट सीडेड राइस (डीआरएस) तकनीक किसानों के लिए एक प्रभावी और जलवायु-अनुकूल विकल्प है। इससे सिंचाई जल, श्रम और उत्पादन लागत में कमी आती है तथा फसल अपेक्षाकृत जल्दी तैयार हो जाती है।

डॉ.एस.आर. पटेल, रिटायर्ड साइंटिस्ट एग्रोनॉमी

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