इरी के वरिष्ठ वैज्ञानिक ने क्षेत्रीय कृषि अनुसंधान केंद्र, बिलासपुर में डीएसआर परीक्षणों का किया निरीक्षण

फसल उत्पादन, कीट एवं रोग प्रबंधन को लेकर वैज्ञानिकों के बीच हुआ गहन विचार-विमर्श
बिलासपुर। क्षेत्रीय कृषि अनुसंधान केंद्र, बैरिस्टर ठाकुर छेदीलाल कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र, बिलासपुर में आज धान की प्रत्यक्ष बीजारोपण पद्धति से संबंधित विभिन्न परीक्षणों का विशेषज्ञों द्वारा निरीक्षण एवं वैज्ञानिक निगरानी की गई। इस अवसर पर अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (इरी) फिलीपींस के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. शलभ दीक्षित (अनुवांशिकी एवं पादप प्रजनन) ने केंद्र में संचालित धान की प्रत्यक्ष बीजारोपण पद्धति (डीएसआर) परीक्षणों का विस्तृत अवलोकन किया।

क्षेत्रीय कृषि अनुसंधान केंद्र, बिलासपुर में डीएसआर से संबंधित अनुवांशिकी एवं पादप प्रजनन, कीट विज्ञान तथा पादप रोग विज्ञान के विभिन्न परीक्षण संचालित किए जा रहे हैं। इन परीक्षणों का प्रमुख उद्देश्य डीएसआर पद्धति के अंतर्गत विभिन्न धान जर्मप्लाज्म/प्रजातियों के उपज एवं उपज घटकों के प्रदर्शन, तथा फसल में होने वाले प्रमुख कीटों एवं रोगों की स्थिति, प्रकोप एवं उनके प्रभाव का वैज्ञानिक अध्ययन करना है।
निरीक्षण के दौरान डॉ. शलभ दीक्षित ने विभिन्न परीक्षण प्लॉटों का भ्रमण कर फसल की वर्तमान स्थिति, पौधों की वृद्धि एवं विकास, उपज क्षमता, उपज घटकों तथा कीट एवं रोगों की स्थिति का अवलोकन किया। उन्होंने वैज्ञानिकों से परीक्षणों की रूपरेखा, प्रबंधन तकनीकों, फसल की प्रतिक्रिया तथा प्राप्त हो रहे प्रारंभिक अवलोकनों के संबंध में विस्तार से जानकारी ली।

इस अवसर पर डॉ. एस.के.वर्मा, मुख्य वैज्ञानिक, क्षेत्रीय कृषि अनुसंधान केंद्र, बिलासपुर, डॉ. अवनीत कुमार, प्रभारी–ब्रीडिंग परीक्षण, डॉ. दिनेश पांडे, वरिष्ठ वैज्ञानिक, कृषि सस्य विज्ञान, डॉ. आर.के.एस. तिवारी, प्रधान वैज्ञानिक (पादप रोग विज्ञान), डॉ. यशपाल सिंह निराला, सहायक प्राध्यापक (कीट विज्ञान), तथा कृषि महाविद्यालय के स्नातकोत्तर कक्षाओं के विद्यार्थी उपस्थित रहे।
निरीक्षण के दौरान डीएसआर पद्धति से जुड़े विभिन्न वैज्ञानिक पहलुओं पर सभी विशेषज्ञों के बीच विस्तृत एवं सार्थक चर्चा हुई। विशेष रूप से डीएसआर में पौध स्थापना, फसल वृद्धि, संभावित उपज क्षमता, खरपतवार प्रबंधन, कीट एवं रोगों की निगरानी तथा फसल उत्पादन में आने वाली विभिन्न चुनौतियों पर विचार-विमर्श किया गया। वैज्ञानिकों ने स्थानीय कृषि-जलवायु परिस्थितियों में डीएसआर तकनीक की संभावनाओं तथा इसके प्रभावी प्रबंधन के विभिन्न पहलुओं पर अपने अनुभव साझा किए।
विशेषज्ञों ने इस बात पर भी चर्चा की कि धान की प्रत्यक्ष बीजारोपण पद्धति को अधिक प्रभावी एवं टिकाऊ बनाने के लिए उन्नत किस्मों का चयन, उचित फसल प्रबंधन, समय पर कीट एवं रोग निगरानी तथा क्षेत्र-विशिष्ट तकनीकी अनुशंसाएं महत्वपूर्ण हैं। परीक्षणों से प्राप्त आंकड़ों एवं अवलोकनों के आधार पर भविष्य में डीएसआर के लिए अधिक उपयुक्त तकनीकों एवं प्रबंधन रणनीतियों के विकास में सहायता मिलने की संभावना है।
डीएसआर परीक्षणों का यह वैज्ञानिक निरीक्षण अनुसंधान, प्रौद्योगिकी विकास और किसानों के लिए व्यावहारिक समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इस प्रकार के विशेषज्ञ निरीक्षण एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर के वैज्ञानिकों के साथ संवाद से स्थानीय स्तर पर संचालित अनुसंधान परीक्षणों को नई दिशा मिलने के साथ-साथ वैज्ञानिकों एवं विद्यार्थियों को भी नवीनतम तकनीकी ज्ञान और अनुभव प्राप्त होता है।