छत्तीसगढ़ के उच्च शिक्षा संस्थानों में अकादमिक गुणवत्ता पर प्रशासनिक औपचारिकता भारी
अतिथि व्याख्याताओं पर टिका अध्ययन-अध्यापन, नीतिगत सुधारों की आवश्यकता
बिलासपुर।। छत्तीसगढ़ के शासकीय महाविद्यालयों में उच्च शिक्षा के स्तर, अध्यापन की वास्तविक जिम्मेदारियों और प्रशासनिक प्राथमिकताओं को लेकर एक गंभीर बहस छिड़ गई है। राज्य के विभिन्न महाविद्यालयों से आ रहे अनुभव यह संकेत देते हैं कि जहाँ एक ओर कक्षाओं को नियमित रूप से संचालित करने और पाठ्यक्रम को पूरा करने का मुख्य दायित्व अतिथि व्याख्याताओं तथा जूनियर अध्यापकों के कंधों पर है, वहीं दूसरी ओर शिक्षण व्यवस्था के भीतर अकादमिक नवाचार के बजाय केवल बाह्य औपचारिकताओं और व्यक्तिगत अनुशासन पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित किया जा रहा है।
अध्यापन के वास्तविक स्वरूप पर प्रश्नचिह्न
वरिष्ठ अकादमिक पदों पर आसीन प्राध्यापकों की भूमिका को लेकर यह चर्चा आम हो चुकी है कि दैनिक पठन-पाठन की प्रक्रिया से उनकी दूरी बढ़ती जा रही है। कक्षाओं में अध्यापन का अधिकांश कार्यभार संविदा एवं अतिथि प्राध्यापकों द्वारा संभाला जा रहा है, जबकि व्यवस्थागत निरीक्षण अक्सर शैक्षणिक गुणवत्ता के बजाय वेशभूषा, व्यक्तिगत उपस्थिति और सतही अनुशासनात्मक बिंदुओं तक सीमित होकर रह जाता है। इस स्थिति के कारण अध्यापन से जुड़े वास्तविक शोध और बौद्धिक माहौल को आघात पहुँच रहा है।
पुस्तकालय एवं संसाधनों का सीमित उपयोग
राज्य सरकार द्वारा महाविद्यालयों में पुस्तकालयों के सुदृढ़ीकरण और नई नियुक्तियों के माध्यम से संसाधनों के विकास का प्रयास तो किया गया है, किंतु इन संसाधनों के क्रियान्वयन में निरंतरता का अभाव दिखता है। लाइब्रेरी जैसे महत्वपूर्ण अकादमिक केंद्र केवल प्रशासनिक औपचारिकताओं तक सीमित रह गए हैं, जहाँ से छात्रों और शोधार्थियों को मिलने वाला वास्तविक लाभ काफी कम है।
स्पष्ट कार्य-नीति और सरकारी दिशा-निर्देशों की आवश्यकता
अकादमिक विशेषज्ञों और अतिथि व्याख्याताओं का मानना है कि उच्च शिक्षा विभाग को इस दिशा में स्पष्ट और जवाबदेह नीतियाँ बनाने की तत्काल आवश्यकता है।
प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं।
कार्य अवधि और दायित्वों की स्पष्टता: अतिथि प्राध्यापकों एवं व्याख्याताओं के लिए निर्धारित अध्यापन अवधि पूर्ण करने के पश्चात अकादमिक स्वतंत्रता और स्पष्ट प्रस्थान नियम लागू किए जाएँ।
अकादमिक ऑडिट का गठन: वरिष्ठ प्राध्यापकों के लिए केवल प्रशासनिक निरीक्षण के स्थान पर अनिवार्य शिक्षण और शोध कार्य के निष्पादन का मूल्यांकन तय किया जाए।
संसाधनों का प्रभावी उपयोग: पुस्तकालयों और प्रयोगशालाओं का सीधा जुड़ाव छात्रों की दैनिक अध्ययन सारणी से अनिवार्य रूप से किया जाए।
छत्तीसगढ़ की उच्च शिक्षा व्यवस्था को केवल औपचारिक अनुपालन से बाहर निकालकर वास्तविक अध्ययन-अध्यापन के वातावरण में ढालने के लिए शासन स्तर से एक सुदृढ़ एवं बाध्यकारी दिशा-निर्देश जारी होना समय की माँग है।