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वो सात किस्में,जो बनी ‘डिजाइनर राईस’…!

प्वाइंटर- स्वाद के साथ सेहत की गारंटी

बिलासपुर- गोल्डन राईस, रोकता है रतौंधी जैसी बीमारी। लो- ग्लाईमिक इंडेक्स राईस का सेवन कर सकेंगे मधुमेह रोगी। इंडियन कौंसिल ऑफ़ एग्रीकल्चरल रिसर्च ने विशेष उद्देश्य के लिए चावल की सात ऐसी किस्में विकसित की हैं जिन्हें ‘डिजाइनर राईस’ की श्रेणी में जगह मिली है।

देश में उपलब्ध चावल की अधिकांश किस्में फोर्टीफाइड या बायो फोर्टीफाइड राईस के रूप में हैं। इनमें गोल्डन राईस को ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मांग को देखते हुए विकसित किया गया है। बदलाव के इस दौर में अब छत्तीसगढ़ की स्थानीय किस्में भी ऐसे गुणों की मांग कर रहीं हैं ताकि आयरन, जिंक, प्रोटीन और लो- ग्लाईसेमिक इंडेक्स जैसे गुणों के समावेश की राह आसान हो सके। यह स्थिति यदि बनी तो छत्तीसगढ़ पोषण युक्त प्रीमियम चावल का प्रमुख उत्पादक राज्य बन सकता है।


शिखर पर गोल्डन राईस

इंडियन कौंसिल ऑफ़ एग्रीकल्चरल रिसर्च ने चावल की जो सात किस्में विकसित की हैं उनमें गोल्डन राईस शिखर पर है। बिटा कैरोटीन से समृद्ध यह चावल विटामिन की कमी दूर करके रतौंधी जैसी बीमारी पर लगाम लगाता है। एनीमिया और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी दूर करने में सक्षम है आयरन एवं जिंक फोर्टीफाइड राईस। हाई प्रोटीन राईस नाम है उस चावल का जो बच्चों, गर्भवती महिलाओं तथा कुपोषित आबादी के लिए विकसित किया गया है।


लो-जी आई राईस

मधुमेह रोगियों के लिए विशेष रूप से प्रसंस्कृत किया गया है, लो- ग्लाईसेमिक इंडेक्स राईस को। रक्त शर्करा धीरे-धीरे बढ़ाता है यह चावल। लाल और काला चावल इसलिए विशेष है क्योंकि एंटीऑक्सीडेंट भरपूर है। ब्लैक राईस इसलिए तेजी से पहचान बना रहा है क्योंकि इसका सेवन हृदय को सेहतमंद बनाए रखता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। प्रसंस्करण के दौरान आयरन फोलिक एसिड और विटामिन- बी2 मिलने के बाद तैयार फोर्टीफाइड राईस पहचान बना चुका है।


संभावित उपयुक्तता

छत्तीसगढ़ की स्थानीय धान की किस्मों जैसे दुबराज, विष्णुभोग, जीराफूल, नागकेसर में उत्कृष्ट स्वाद एवं सुगंध है। इन पारंपरिक किस्मों में भी आयरन, जिंक, प्रोटीन और लो- ग्लाईसेमिक इंडेक्स जैसे गुणों का वैज्ञानिक समावेश किया जाए तो अपना प्रदेश वैश्विक स्तर पर पोषण युक्त प्रीमियम चावल का प्रमुख उत्पादक बन सकता है।

वर्जन
अधिक उत्पादन नहीं पोषण सुरक्षा महत्वपूर्ण

डिजाइनर राईस केवल अधिक उत्पादन का नहीं, बल्कि ‘पोषण सुरक्षा’ का भविष्य है। छत्तीसगढ़ की पारंपरिक सुगंधित धान किस्मों—दुबराज, विष्णुभोग, जीराफूल और नागकेसर—में आधुनिक जैव-सुदृढ़ीकरण (बायोफोर्टिफिकेशन) और कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स जैसे गुणों का समावेश कर उन्हें वैश्विक प्रीमियम एवं स्वास्थ्यवर्धक चावल के रूप में स्थापित किया जा सकता है। इससे किसानों की आय, उपभोक्ताओं का स्वास्थ्य और राज्य की विशिष्ट पहचान—तीनों को एक साथ नई दिशा मिलेगी।

डॉ.एस.आर.पटेल, रिटायर्ड साइंटिस्ट (एग्रोनॉमी), इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर

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