सड़को पर बैठे आवारा मवेशियों से जान का बना हुआ है खतरा
बिलासपुर।आवारा मवेशियों का बढ़ता आतंक अब स्मार्ट सिटी की सबसे बड़ी परेशानी बन चूका है। हाईकोर्ट के सख्त निर्देशों के बावजूद शहर की तस्वीर ज्यादा नहीं बदली। मुख्य सड़कें, चौक-चौराहे या फ्लाईओवर पर मौजूद मवेशियों से हर दिन हादसों का खतरा बना रहता है। इस मुद्दे पर अब राजनीति भी तेज हो गई है।
दरअसल बिलासपुर में ट्रैफिक से ज्यादा डर सड़क पर बैठे मवेशियों से रहता है। चौक, व्यस्त सड़कें और फ्लाईओवर तक मवेशियों से अटे पड़े हैं। कई बार अचानक सड़क पर आ जाने या बीच रास्ते बैठ जाने से वाहन चालकों का संतुलन बिगड़ जाता है और हादसे होते हैं। कई लोग घायल हो चुके हैं, लेकिन हालात अब भी जस के तस हैं। जानकारी के मुताबिक जिले में 25 हजार से ज्यादा आवारा मवेशी हैं। इनके संरक्षण के लिए गौशालाएं और कई सरकारी योजनाएं संचालित हैं, लेकिन उनका असर सड़कों पर दिखाई नहीं देता। नगर निगम अभियान चलाने का दावा करता है, फिर भी शहर की सड़कों पर मवेशियों की संख्या कम नहीं हो रही। हाईकोर्ट भी इस मामले में सख्त निर्देश दे चुका है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर सुधार अभी भी अधूरा है। आवारा मवेशियों का मुद्दा अब सियासी बहस का विषय बन गया है। कांग्रेस का आरोप है कि उनकी सरकार की गौठान योजना को वर्तमान सरकार ने प्रभावी ढंग से आगे नहीं बढ़ाया, जिसके कारण बड़ी संख्या में मवेशी दोबारा सड़कों पर आ गए हैं। कांग्रेस का कहना है कि इससे सड़क दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं और पशुधन भी असुरक्षित हो गया है। वहीं इन आरोपों पर पलटवार करते हुए महापौर पूजा विधानी का कहना है कि नगर निगम लगातार अभियान चलाकर आवारा मवेशियों को पकड़कर गौशालाओं तक पहुंचा रहा है। साथ ही पशुपालकों पर भी कार्रवाई की जा रही है ताकि मवेशी सड़कों पर न छोड़े जाएं। इस पूरे मामले पर कलेक्टर संजय अग्रवाल का कहना है कि सरकार की योजनाओं के अनुरूप लगातार व्यवस्था बनाई जा रही है। पशुपालकों को भी समझाइश दी जा रही है कि वे अपने मवेशियों को सड़कों पर न छोड़ें और निर्धारित स्थानों पर रखें, ताकि सड़क दुर्घटनाओं पर अंकुश लगाया जा सके।
फिलहाल हाईकोर्ट के निर्देश, सरकार के दावे, नगर निगम के अभियान और विपक्ष के आरोप-प्रत्यारोप अपनी जगह हैं… लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर स्मार्ट सिटी की सड़कें आवारा मवेशियों से कब मुक्त होंगी? जब तक इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा, तब तक हर सफर खतरे से खाली नहीं होगा और सड़कों पर लोगों की सुरक्षा सवालों के घेरे में बनी रहेगी।